अब्दुल्ला सेठ ने बनाया उन्हें महात्मा!
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गांधी जी के अंदर सेकुलरिज्म के ऐसे पुख्ता संस्कार डालने में भी मुसलमानों का बड़ा रोल रहा है। मोहनदास करमचंद गांधी बीसवीं सदी के इतिहास में वह शख्सियत थे जिन पर देश का आम मुसलमान पक्की तौर पर भरोसा करता था। मगर कुछ सिरफिरे तत्वों के कारण पाकिस्तान बना और न चाहते हुए भी बहुतेरे मुसलमान हिंदुस्तान छोड़कर पाकिस्तान चले गए, फिर पछताए भी। कुछ वापस भी आना चाहते थे लेकिन दो देश बन जाने की वजह से कुछ नामी-गिरामी लोगों को छोड़कर बाक़ी को पाकिस्तान में अनिच्छा पूर्वक रहना पड़ा। लेकिन गांधी जी के अंदर सेकुलरिज्म के ऐसे पुख्ता संस्कार डालने में भी मुसलमानों का बड़ा रोल रहा है और इसके लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा।

गांधी जी जब दक्षिण अफ्रीका में अब्दुल्ला सेठ के वकील बन कर गए तब उन अब्दुल्ला सेठ ने अपने वकील मोहनदास करमचंद गांधी को हिन्दुस्तानियों के हित के लिए लड़ने को प्रेरित किया। हालांकि इससे अब्दुल्ला सेठ को निजी तौर पर नुकसान हुआ लेकिन उन्होंने गांधी जी से कहा तुम मेरे हितों की परवाह मत करो। स्वयं गांधी जी ने उन अब्दुल्ला सेठ के बारे में काफी कुछ लिखा है। मज़े की बात कि ये वही अब्दुल्ला सेठ थे जिन्होंने गांधी जो को दक्षिण अफ्रीका बुलाया था अपने मुकदमे की पैरवी के लिए। पर अब्दुल्ला सेठ को मुकदमे से ज्यादा लगाव अपने वकील मोहनदास करमचंद गांधी की देसी ठसक पर था। इसीलिए अपने मुकदमे की वाट लगाकर भी सेठ ने गांधी जी को अपने स्वाभिमान के लिए लड़ना सिखाया।

गांधीजी उन्हीं अब्दुल्ला सेठ के बारे में लिखते हैं-

अब्दुल्ला सेठ पढ़े-लिखे बहुत कम थे। अक्षर-ज्ञान कम था पर अनुभव-ज्ञान बहुत बड़ा था। उनकी बुद्धि तेज थी और वह खुद भी इस बात को जानते थे। अभ्यास से अँग्रेजी इतनी जान ली थी कि बोलचाल का काम चला लेते। परन्तु इतनी अंग्रेजी के बल पर वह अपना सारा काम चला लेते थे। बैंक में मैनेजरों से बात कर लेते। योरोपियन व्यापारियों से सौदा कर लेते, वकीलों को अपना मामला समझा देते।  हिन्दुस्तानियों में उनका काफी मान था। उनकी पेढ़ी उस समय हिंदुस्तानियों में सबसे बड़ी तो नहीं तो, बड़ी पेढ़ियों में अवश्य थी। उनका स्वभाव वहमी था।

वह इस्लाम का बड़ा अभिमान रखते थे। तत्वज्ञान की बातों के शौकीन थे। अरबी नहीं जानते थे फिर भी कुरान-शरीफ तथा आमतौर पर इस्लामी धर्म साहित्य की वाकफियत उन्हें अच्छी थी। दृष्टान्त तो जबान पर हाजिर रहते थे। उनके सहवास से मुझे इस्लाम का अच्छा व्यावहारिक ज्ञान हुआ। जब हम एक-दूसरे को जान-पहचान गए तब वह मेरे साथ बहुत धर्म-चर्चा किया करते। दूसरे या तीसरे दिन मुझे डरबन अदालत दिखाने ले गए। वहां कितने ही लोगों से परिचय कराया। अदालत में अपने वकील के पास मुझे बिठाया। मजिस्ट्रेट मेरे मुंह की ओर देखता रहा। उसने कहा- अपनी पगड़ी उतार लो!

मैंने इंकार कर दिया और अदालत से बाहर चला आया

मेरे नसीब में तो यहां भी लड़ाई लिखी थी

पगड़ी उतरवाने का रहस्य मुझे अब्दुल्ला सेठ ने समझाया। मुसलमानी लिबास पहननेवाला अपनी पगड़ी यहां पहन सकता है। दूसरे भारतवासियों को अपनी पगड़ी उतार लेनी चाहिए

पगड़ी उतार देने का अर्थ था मान-भंग सहन करना। सो मैने तो यह तरकीब सोची कि हिन्दुस्तानी पगड़ी को उतार कर अँग्रेजी टोप पहना करूँ, जिससे उसे उतारने में मान-भंग का सवाल न रह जाए और मैं इस झगड़े से भी बच जाऊँ

पर अब्दुल्ला सेठ को यह तरकीब पसंद न आई। उन्होंने कहा- यदि आप इस समय ऐसा करेंगे तो उसका उल्टा अर्थ होगा। जो लोग देशी पगड़ी पहने रहना चाहते होंगे उनकी स्थिति विषम हो जाएगी। फिर आपके सिर पर अपने ही देश की पगड़ी शोभा देती है। आप अगर अँग्रेजी टोपी लगाएंगे तो लोग "वेटर" समझेंगे।

इन वचनों में दुनियावी समझदारी थी, देशाभिमान था और कुछ संकुचितता भी थी। समझदारी तो स्पष्ट ही है। स्वाभिमान के बिना पगड़ी पहनने का आग्रह नहीं हो सकता था। संकुचितता के बिना वेटर की उपमा नहीं सूझती। गिरमिटिया भारतीयों में हिन्दू, मुसलमान और ईसाई तीन विभाग थे। जो गिरमिटिया ईसाई हो गए, उनकी संतति ईसाई थी। 1893 ईस्वी में भी उनकी संख्या बढ़ी थी। वे सब अँग्रेजी लिबास में रहते। उनका अच्छा हिस्सा होटलों में नौकरी करके जीविका उपार्जन करता। इसी समुदाय को लक्ष्य करके अँग्रेजी टोपी पर अब्दुल्ला सेठ ने यह टीका की थी। उनके अंदर वह भाव था कि होटल में "वेटर" बनकर रहना हल्का काम है। आज भी यह विश्वास बहुतों के मन में कायम है।

कुल मिलाकर अब्दुल्ला सेठ की बात मुझे अच्छी प्रतीत हुईं। मैंने पगड़ीवाली घटना पर पगड़ी का तथा अपने पक्ष का समर्थन अखबारों में किया। अखबारों में उस पर खूब चर्चा चली। अनवेलकम विजिटर- अनचाहा अतिथि- के नाम से मेरा नाम अखबारों में आया और तीन-चार दिन के अंदर ही अनायास ही दक्षिण अफ्रीका में मेरी ख्याति हो गई। किसी ने मेरा पक्ष-समर्थन किया, किसी ने मेरी गुस्ताखी की भरपेट निन्दा की। मेरी पगड़ी तो लगभग अंत तक कायम रही।

(आ. क. 1927)

हकीम अजमल खाँ

इसी तरह गांधी जी ने दिल्ली के हकीम अजमल खाँ के बारे में भी काफी कुछ लिखा है। वे लिखते हैं कि हकीम अजमल खाँ बड़े हकीम तो थे ही बड़े स्वप्नदृष्टा भी थे। जामिया मिलिया को दिल्ली लाने का श्रेय हकीम साहब को ही है।

"एक जमाना था, शायद सन् 15 की साल में, जब मैं दिल्ली आया था, हकीम साहब से मिला और डॉक्टर अंसारी से। मुझसे कहा गया कि हमारे दिल्ली के बादशाह अँग्रेज नहीं हैं, बल्कि ये हकीम साहब हैं। डॉक्टर अंसारी तो बड़े बुजुर्ग थे, बहुत बड़े सर्जन थे, वैद्य थे। वह भी हकीम साहब को जानते थे, उनके लिए उनके दिल में बहुत कद्र थी। हकीम साहब भी मुसलमान थे, लेकिन वे तो बहुत बड़े विद्वान थे, हकीम थे। यूनानी हकीम थे, लेकिन आयुर्वेद का उन्होंने कुछ अभ्यास किया था। उनके यहां हजारों मुसलमान आते थे और हजारों गरीब हिन्दू भी आते थे। दूसरी तरफ बड़े साहूकार, धनी-मानी मुसलमान और खूब सम्पन्न हिन्दू भी आते थे। और एक दिन का हजार रुपये उनको देते थे। जहां तक मैं हकीम साहब को पहचानता था, उन्हें रुपयों की नहीं पड़ी थी, लेकिन उनकी खिदमत की खातिर उनका पेशा था। वह तो बादशाह जैसे थे। आखिर में उनके बाप-दादा तो चीन में रहते थे, चीन के मुसलमान थे, लेकिन बड़े शरीफ थे।

हकीम जी कोरे स्वप्नदृष्टा ही नहीं थे। उन्हें विश्वास था कि मेरा स्वप्न एक दिन पूरा होगा ही। जिस तरह तिब्बी कालेज के द्वारा उनका देशी चिकित्सा का स्वप्न फला, इसी तरह अपना राजनीतिक स्वप्न भी उन्होंने जामिया मिलिया के जरिए पूरा करने की कोशिश की। जबकि जामिया मरणासन्न हो रही थी, उस समय हकीम साहब ने प्राय: अकेले ही उसे अलीगढ़ से दिल्ली लाने का सारा भार उठाया। मगर जामिया को हटाने से खर्च भी बढ़ा। तब से वह अपने को जामिया की आर्थिक स्थिरता के लिए खास तौर पर जिम्मेदार मानने लगे थे। उसके लिए धन जमा करने में सबसे मुख्य मनुष्य वह ही थे, चाहे वह अपने पास से दें या अपने दोस्तों से चन्दे दिलवाएं।

अली बंधुओं के बारे में गांधी जी

शौकत अली सरल और मिलनसार आदमी हैं, पर कट्टर हैं। और किसी का उन्हें भय और दबाव नहीं हैं

(यं. इं. 23. 6. 20)

मौ. शौकत अली तो बड़े से बड़े शूरवीरों में से एक हैं। उनमें बलिदान की अद्भुत योग्यता है और उसी तरह खुदा के मामूली से मामूली जीव को चाहने की उनकी प्रेम शक्ति भी अजीब है। वह खुद इस्लाम पर फिदा हैं, पर दूसरे धर्मों से वह घृणा नहीं करते। मौ. मोहम्मद अली इनका दूसरा शरीर है। मौ. मोहम्मद अली में मैने बड़े भाई के प्रति जितनी अनन्य निष्ठा देखी है उतनी कहीं नहीं देखी। उनकी बुद्धि ने यह बात तय कर ली है कि हिन्दू-मुसलमान एकता के सिवा हिन्दुस्तान के छुटकारे का कोई रास्ता नहीं।  उनका पैन इस्लामवाद हिन्दू विरोधी नहीं है। इस्लाम भीतर और बाहर से शुद्ध हो जाए और बाहर के हर किस्म के हमलों से संगठित होकर टक्करें ले सके ऐसी स्थिति देखने की तीव्र आकांक्षा पर कोई कैसे आपत्ति कर सकता है? कोकोनाडा के उनके भाषण का एक हिस्सा बहुत ही आपत्तिजनक बताकर मुझे दिखाया गया था। मैंने मौलाना का ध्यान उस पर खींचा। उन्होंने उसी दम स्वीकार किया कि हाँ, वास्तव में यह भूल हुई। कुछ दोस्तों ने मुझे सूचना दी है कि मौ. शौकत अली के खिलाफ परिषद वाले भाषण में कितनी ही बातें आपत्तिजनक हैं। यह भाषण मेरे पास है परन्तु उसे पढ़ने का मुझे समय नहीं मिल पाया। यह मैं जरूर जानता हूं कि यदि सचमुच उसमें ऐसी कोई बात होगी जिससे किसी का दिल दुखी हो तो मौ. शौकत अली ऐसे लोगों में पहले व्यक्ति हैं जो उसको ठीक करने के लिए तैयार रहते हैं।

(हि. न. 01. 06. 1924)

अली भाइयों के जेल जाने के बाद मुस्लिम लीग की सभा में मुझे मुसलमान भाई ले गए थे। वहां मुझसे बोलने के लिए कहा गया था, मैं बोला। अली-भाइयों को छुड़ाने का धर्म मुसलमानों को समझाया। इसके बाद वे मुझे अलीगढ़ कालेज में भी ले गए थे। वहां मैंने मुसलमानों को देश के लिए फकीरी लेने का न्यौता दिया था।  अली-भाइयों को छुड़ाने के लिए मैंने सरकार के साथ पत्र-व्यवहार चलाया। इस सिलसिले में इन भाइयों की खिलाफत संबंधी हलचल का अध्ययन किया। मुसलमानों के साथ भी चर्चा की। मुझे लगा कि अगर मैं मुसलमानों का सच्चा मित्र बनना चाहूं तो मुझे अली-भाइयों को छुड़ाने में और खिलाफत का प्रश्न न्यायपूर्वक हल करने में पूरी मदद करनी चाहिए। खिलाफत का प्रश्न मेरे लिए सहज था। उसके स्वतंत्र गुण-दोष तो मुझे देखने भी नहीं थे। मुझे ऐसा लगा कि उस संबंध में मुसलमानों की माँग नीति-विरुद्ध न हो तो मुझे उसमें मदद देनी चाहिए। धर्म के प्रश्न में श्रद्धा सर्वोपरि होती है। सबकी श्रद्धा एक ही वस्तु के बारे में एक ही-सी हो तो फिर जगत में एक ही धर्म हो सकता है। खिलाफत संबंधी माँग मुझे नीति-विरुद्ध नहीं जान पड़ी। इतना ही नहीं बल्कि यही माँग इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री लॉयड जार्ज ने स्वीकार की थी, इसलिए मुझे तो उनसे अपने वचन का पालन कराने भर का ही प्रयत्न करना था। वचन ऐसे स्पष्ट शब्दों में थे कि मर्यादित गुण-दोष की परीक्षा मुझे सहज अपनी अंतरात्मा को प्रसन्न करने की ही खातिर करनी थी।

(आ. क. 1928)

उन्हें (मौ. शौकत अली) उर्दू कवियों के बढ़िया वचन जबानी याद हैं। जब वे ये वचन सुनाते थे और उस जमाने में जो बातें करते थे, उस वक्त भी वह ईमानदार थे। आज भी ईमानदार हैं। मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि वह झूठ बोलते या धोखा देते थे। आज वह मानते हैं कि हिन्दू विश्वासपात्र नहीं हैं और उनके साथ लड़ लेने में ही कौम का भला है। यह मनोदशा बुरी है। मगर कौम की सेवा उनके दिल में है, उनका कोई स्वार्थी हेतु नहीं है। ऐसे ईमानदार आदमी बहुत मौजूद हैं।

(म. डा. भाग 1, 04. 07. 1932)

स्व. मौलाना शौकत अली के स्मारक के बारे में मैने कई तजबीजें पढ़ी हैं। ज्यों ही मुझे मौलाना की मृत्यु के बारे में मालूम हुआ, जिसकी कि अभी बिल्कुल ही आशा नहीं थी, मैंने कुछ मुसलमान मित्रों को उनके साथ अपने अंतस्थल की सम्वेदना प्रकट करते हुए लिखा। उनमें से एक मित्र ने लिखा है-

“…….मैं यह जानता हूं कि मौ. शौकत अली अपने खास ढंग से सच्चा हिन्दू-मुस्लिम समझौता कराने के लिए सचमुच चिन्तित थे। स्वर्ग में उनकी आत्मा को यह जानकर कि उनका एक जीवन-उद्देश्य आखिरकार पूरा हो गया, जितनी शान्ति मिलेगी उतनी किसी दूसरे काम से नहीं। ऐसे भी लोग हो सकते हैं, जिन्हें कि इसमें सन्देह हो, लेकिन मौलाना को और उनका दिमाग किस तरह काम करता था इसको अच्छी तरह जानकर, जैसा कि मैं उन्हें जानता था, मैं भरोसे के साथ इस बात की ताईद कर सकता हूं।

कभी-कभी जो वह जोश में आकर खिलाफ बोल जाते थे, उसके बावजूद मौलाना के दिल में एकता और शान्ति के लिए वही तमन्ना थी जिसके लिए कि वह खिलाफत के दिनों में बड़े मोहक ढंग से बोलते व काम करते थे। मुझे इसमें कोई शक नहीं कि उनकी यादगार में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही कौमों का एकता के लिए हुआ संयुक्त निश्चय ही सबसे सच्चा स्मारक होगा।

खाली कागज एकता का निश्चय नहीं, बल्कि दिली एकता का, जिसका आधार शक और बेऐतबारी नहीं, बल्कि आपस का विश्वास होगा। कोई दूसरी एकता हमें नहीं चाहिए और इस एकता के बिना हिन्दुस्तान के लिए सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती।

(ह. से. 17. 12. 1938)

मौ. मुहम्मद अली साहब भी कहते थे कि हमें अँग्रेजों से लड़कर स्वराज्य लेना है और हमारी लड़ाई होगी तकली की तोपों से और कुकुडिय़ों के गोलों से। वह जो विद्वान था, उतना ही कल्पनाएं दौड़ानेवाला था।

(प्रा. प्र. 05. 04. 1946)

(जन सेवक एवं सत्य-अहिंसा के शोधार्थी द्वारा संकलित किए गए गांधी साहित्य से लिए गए अंश।)

डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी

दिल्ली के जिन मुस्लिम नेताओं ने गांधी जी को प्रभावित किया उनमें हकीम अजमल खाँ के बाद डॉक्टर मुख्तार अहमद अंसारी का नाम प्रमुख है। गांधी जी जब दक्षिण अफ्रीका से वापस आए तो हिन्दुस्तान की राजनीति में दिल्ली के दो मुस्लिम नेता राजनीतिक क्षितिज पर छाए हुए थे। हकीम अजमल खाँ और डॉक्टर मुख्तार अहमद अंसारी। यूपी के गाजीपुर जिले की मोहम्मदाबाद तहसील के गांव यूसुफ पुर के मूल निवासी डॉक्टर अंसारी उन दिनों लंदन से एमएस और एमडी की डिग्री लेकर आए थे और डाक्टरी विद्या के वे प्रचंड ज्ञाता थे। मुस्लिम लीग और कांग्रेस दोनों में ही वे एक्टिव थे। पर जब मुहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस से दूरी बरतने लगे तो डॉक्टर अंसारी मुस्लिम लीग छोड़कर गांधी व नेहरू के साथ आ गए। वे 1927 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। गांधी जी ने उनकी अध्यक्षता के लिए मार्मिक अपील भी की थी। गांधी जी द्वारा की गई अपील के अंश-

आगामी वर्ष के लिए डॉ. अंसारी का महासभा के अध्यक्ष-स्थान के लिए चुनाव होना प्राय: निश्चित-सा है। राष्ट्रीय क्षितिज पर इस चुनाव में आपत्ति करने वाला कोई नहीं है। डॉ. अंसारी जितने अच्छे मुसलमान हैं, उतने ही अच्छे भारतीय भी हैं। उनमें धर्मोन्माद की तो किसी ने शंका ही नहीं की है। वर्षों तक वे एक साथ महासभा के सह मंत्री रहे हैं। हाल ही में एकता के लिए किए गए उनके प्रयत्नों को तो सब कोई जानते हैं और सच्ची बात तो यह है कि अगर बेलगांव में मैं, कानपुर में श्रीमती सरोजनी नायडू और गोहाटी में श्रीयुत आयंगर मार्ग में न आते तो इनमें से किसी भी अधिवेशन के अध्यक्ष डॉ. अंसारी ही चुने जाते, क्योंकि जब ये चुनाव हो रहे थे तब उनका नाम प्रत्येक आदमी की जबान पर था, परन्तु कुछ खास कारणों से डॉ. अंसारी का हक आगे बढ़ा दिया गया और ज्ञात होता है कि विधि ने उनके चुनाव को इसीलिए आगे धकेल दिया था कि वे ऐसे मौके पर आवें जब देश को उनकी सबसे अधिक जरूरत हो। अगर हिन्दू-मुस्लिम एकता की कोई योजना दोनों पक्षों को ग्रहण करने योग्य मालूम हो तो नि:संदेह डॉ. अंसारी ही उसे महासभा के द्वार पर ले जा सकते हैं। ...अकेली यही बात (सर्वसम्मति से और हृदय से एक मुसलमान को अपना अध्यक्ष चुनना) हिन्दुओं की ओर से इस बात का साफ प्रमाण होगा कि हिन्दू एकता को दिल से चाहते हैं, और राष्ट्रीय विचारों वाले मुसलमानों में डॉ. अंसारी की अपेक्षा साधारणतया मुसलमान जनता में अधिक आदृत कोई नहीं है। इसलिए मेरे ख्याल से तो यही अच्छा है कि अगले साल के लिए डॉ. अंसारी ही राष्ट्रीय महासभा के कर्णधार हों, क्योंकि केवल किसी योजना को मंजूर कर लेना ही हमारे लिए काफी नहीं है। दोनों पक्षों द्वारा उसे मंजूर कराने की बनिस्बत उसे कार्य में परिणित करना शायद कहीं अधिक जरूरी है। और यदि हम मान लें कि दोनों पक्षों का समाधान करने वाली एक योजना मंजूर हो भी गई तो उस पर अमल करते समय बराबर सावधानी की आवश्यकता होगी। डॉ. अंसारी ऐसे ही काम के लिए सबसे अधिक योग्य पुरुष हैं। इसलिए मैं आशा करता हूं कि सभी प्रांत एकमत से डा. अंसारी के नाम को ही उस सर्वोच्च सम्मान के लिए सूचित करेंगे जो कि राष्ट्रीय महासभा के अधीन है।

(हि. न. 21.07.1927)

बापू ने यह लेख डॉ. अंसारी की मृत्यु पर शोक जताते हुए लिखा था-

वह निसंदेह हकीम अजमल खाँ की तरह ही हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य के एक प्रतिरूप थे। कड़ी से कड़ी परीक्षा के समय भी वह अपने विश्वास से कभी डिगे नहीं। वह एक पक्के मुसलमान थे। हजरत मुहम्मद साहब की जिन लोगों ने जरूरत के वक्त मदद की थी, वह उनके वंशज थे और उन्हें इस बात का गर्व था। इस्लाम के प्रति उनमें जो दृढ़ता थी और उसका उन्हें जो प्रगाढ़ ज्ञान था उस दृढ़ता और उस ज्ञान ने ही उन्हें हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य में विश्वास करने वाला बना दिया था। अगर यह कहा जाए कि जितने उनके मुसलमान मित्र थे उतने ही हिन्दू मित्र थे तो इसमें कोई अतिशयोक्ति न होगी। सारे हिन्दुस्तान के काबिल-से-काबिल डाक्टरों में उनका नाम लिया जाता था। किसी भी कौम का गरीब आदमी उनसे सलाह लेने जाए, उसके लिए बेरोकटोक उनका दरवाजा खुला रहता था। उन्होंने राजा-महाराजाओं और अमीर घरानों से जो कमाया वह अपने जरूरतमंद दोस्तों में दोनों हाथों से खर्च किया। कोई उनसे कुछ माँगने गया तो कभी ऐसा नहीं हुआ कि वह उनकी जेब खाली किए बगैर लौटा हो। और उन्होंने जो दिया उसका कभी हिसाब नहीं रखा। सैकड़ों पुरुषों और स्त्रियों के लिए वह एक भारी सहारा थे। मुझे तनिक भी संदेह नहीं कि सचमुच वह अनेक लोगों को रोते-बिलखते छोड़ गए हैं। उनकी पत्नी बेगम साहिबा तो ज्ञान पारायणा हैं, यद्यपि वह हमेशा बीमार-सी रहती हैं। वह इतनी बहादुर हैं और इस्लाम पर उनकी इतनी ऊँची श्रद्धा है कि उन्होंने अपने प्रिय पति की मृत्यु पर एक आँसू भी नहीं गिराया। पर जिन अनेक व्यक्तियों को मैं याद करता हूं वे ज्ञानी या फिलॉस्फर नहीं हैं। ईश्वर में तो उनका विश्वास हवाई है, पर डॉ. अंसारी में उनका विश्वास जीवित विश्वास था। इसमें उनका कोई कसूर नहीं। डॉक्टर साहब की मित्रता के उनके पास ऐसे अनेक प्रमाण थे कि ईश्वर ने जब तक उन्हें छोड़ दिया तब डॉक्टर साहब भी उनकी मदद तभी तक कर सके, जब तक कि सिरजनहार ने उन्हें ऐसा करने दिया। जिस काम को वे जीवित अवस्था में पूरा नहीं कर सके, ईश्वर करे वह उनकी मृत्यु के बाद पूरा हो जाए।

(ह. से. 16.05.1936)

(महात्मा गांधी के इन सपनों को साझा करने के लिए मैंने सर्व सेवा संघ प्रकाशन की पुस्तक गांधी साहित्य जैसा मैंने उन्हें जाना समझा की मदद ली है।)

शंभूनाथ शुक्ल

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