हिस्ट्री एक दिन में नहीं बनती: नितिन ठाकुर
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ये तो सच है. लेकिन सच ये भी है कि कोई एक दिन होता है जब वो घटती है. करीब 102 साल पहले अप्रैल महीने में एक शाम कुछ ऐसा हुआ कि आज भी उसका ज़िक्र छिड़ जाता है. बैसाखी का दिन था वो. शहर अमृतसर था. अंग्रेजों का ज़माना चल रहा था और फर्स्ट वर्ल्ड वॉर खत्म होने के बाद वो खुद को एक बार फिर से मज़बूत कर रहे थे. बहुत सारे वादे जो ब्रिटिश सरकार ने जंग के दौरान किए उन्हें अब भुलावे के संदूकों में बंद कर दिया गया था. ऊपर से एक काला कानून रौलेट एक्ट हिंदुस्तान की छाती पर थोपा गया. इस कानून से वो पंजाब भड़क उठा जिसने ब्रिटिश सेना को सबसे ज़्यादा सिपाही लड़ने के लिए दिए थे. इसी गुस्से का इज़हार पूरे पंजाब में ज़ोरों पर था. 1857 में चोट खा चुके अंग्रेज़ छूट देने के मूड में कतई नहीं थे. अमृतसर में प्रदर्शनकारी भीड़ पर गोली चल गई जिसमें कुछ लोग मारे गए. बदले में भीड़ ने भी कुछ फिरंगियों को मारा. बैंकों को लूटा. एक अंग्रेज़ नर्स के साथ मारपीट कर दी. नाराज़ ब्रिटिश अफसरों ने शहर में मार्शल लॉ लगा दिया. कांग्रेस के दो बड़े नेताओं डॉ सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर लिया. नेताओं की गिरफ्तारी से अमृतसर और उबला.  ठीक बैसाखी के दिन स्वर्ण मंदिर के पास जलियांवाला बाग में एक जलसा बुला लिया गया. बहुत से लोग मत्था टेकने के बाद वहां आराम करने आ ही जाया करते थे. एक पशु मेला भी करीब ही लगता था जिसमें लोग जानवर खरीदते बेचते. बैसाखी का त्यौहार था तो दूर दराज के इलाकों से भी लोग पहुंचे. इसके आगे का हाल सब जानते हैं.

शाम सवा पांच बजे करीब जनरल डायर उस संकरी गली से जलियांवाला बाग में सिपाहियों के साथ घुसा जो बाग में आने जाने का इकलौता रास्ता थी. ये वही डायर था जिसके पिता ने 1855 में बीयर बनाने की पहली भारतीय कंपनी कसौली में सेटअप की थी. नाम डायर ब्रेवरीज़ रखा. इसने एशिया की पहली बीयर 'लॉयन' बनाई थी जो अब तक बिक रही है.  बाद में उन्होंने सोलन, शिमला, मर्री, रावलपिंडी, क्वेटा, मांडले तक ब्रेवरीज़ खोलीं. 1887 में एच जी मैकिन नाम के एक व्यापारी ने भारत आकर शिमला और सोलन वाली ब्रेवरीज़ खरीदकर अपना काम शुरू कर दिया लेकिन पहले विश्वयुद्ध के बाद दोनों  मैकिन और डायर ब्रेवरीज़ कंपनियां एक हो गईं. 1937 में नाम पड़ा- डायर मैकिन ब्रेवरीज़ और ये लंदन स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट हुई. आज़ादी के बाद नरेंद्र नाथ मोहन ने लंदन जाकर इस कंपनी की ज़्यादातर हिस्सेदारी खरीद ली और 1967 इसका वो नाम रखा जिसे आप पहचानते हैं- मोहन मैकिन ब्रेवरीज़. 1982 तक कंपनी बहुत कुछ बनाने लगी तो ब्रेवरीज़ शब्द भी हटा दिया. वैसे आपको इसकी बनाई ओल्म मोंक रम तो याद होगी ही. ब्लैक नाइट, मैकिन 10,000 और सोलन नंबर वन व्हिस्की भी.

तो खैर उसी जनरल डायर ने बाग में घुसने के तीस सेकेंड के भीतर गुरखा और बलूची सिपाहियों से बंदूकें तान लेने को कहा. वो इस मामले में मजबूर था कि टैंक अंदर नहीं ला सका क्योंकि गली संकरी थी वरना इरादा तो उसका गोले छोड़ने का था जो उसने खुद बाद में स्वीकारा भी. भाषण चल रहे थे. लोगों ने सिपाहियों को देखा भी मगर वो सहमकर भी वहीं रहे. उन्हें भरोसा था कि दुनिया को सभ्यता का पाठ पढ़ानेवाले अंग्रेज़ उन निहत्थे लोगों पर गोलियां थोड़े ही बरसाएंगे. कम से कम उस दिन वो गलत थे. डायर के दिमाग में अपनी ही योजना थी. उसने टाइम नहीं खराब किया. दस मिनटों तक निहत्थे लोगों पर 1650 राउंड गोलियां चलवाईं. मरनेवालों की असल तादाद आज तक नहीं मालूम. डायर ने उड़ती हुई गणित लगाई कि 200-300 मरे होंगे. उसकी लापरवाही का अंदाज़ा ऐसे लगाइए कि मृतकों की इस संख्या का अनुमान उसने अस्पताल, मरघट या बाग में लाशें गिनकर नहीं लगाया था. अपने जंग के पुराने अनुभव का इस्तेमाल किया. उंगली पर खर्च हुई गोलियों के राउंड गिने और मान लिया कि पांच गोलियों से एक आदमी मरता है तो इस हिसाब से जो गणित बैठा लिख डालो. वैसे सरकार का ऑफिशियल आंकड़ा 379 कहता है. सेवा समिति ने घर घर जाकर 530 का आंकड़ा जुटाया. पंडित मदनमोहन मालवीय ने कहा कि कम से कम एक हज़ार की जान गई, जिनमें सबसे छोटा शहीद  सात महीने का बच्चा था. जब मरनेवालों का नहीं पता तो घायलों का हिसाब कौन रखता.

डायर में एक अजीब सी क्रूरता थी जबकि वो इसी देश में पैदा हुआ था. पांच भारतीय भाषाएं आसानी से बोलता था. जलियांवाला बाग वाले कांड से दो हफ्ते पहले वो अपने परिवार को कुतुब मीनार दिखाने ले गया था. रौलेट एक्ट के खिलाफ प्रदर्शन जारी थे. रास्ते में एक उत्साही भीड़ से निकलकर दो लोग उसकी कार के पीछे वाले हिस्से पर चढ़ गए. लुधियाना से जालंधर के बीच उसकी कार की छत पर एक पत्थर भी फेंका गया था. वो चिढ़ा और सहमा था. लग रहा था जैसे भारतीय अंग्रेज़ों से डर ही नहीं रहे. इन्हीं छोटी बड़ी घटनाओं ने उसे इस नतीजे पर पहुंचाया कि भारतीयों को सबक सिखाना ज़रूरी है. उसने खुद इन बातों को हंटर कमीशन के सामने गर्व से मंज़ूर किया था जिसने उसे कोई सज़ा नहीं दी थी. इस कमीशन के एक सदस्य तीस्ता सीतलवाड़ के पड़दादा चिमनलाल हरिलाल सीतलवाड़ थे. कमीशन की सुनवाई के दौरान ही उनका झगड़ा हंटर से हो गया था. डायर से किए गए उनके सख्त सवाल और डायर के लापरवाह मगर खुले जवाबों ने हंटर कमीशन की उस पूरी सुनवाई को बेहद दिलचस्प बना दिया था. बहरहाल, इस कांड के बाद रात आठ बजे से सुबह तक कर्फ्यू लगा रहा था. बाग में लाशें ऐसे ही पड़ी रहीं. लाशों के बीच भूखे- प्यासे-लाचार घायल दबे रहे. जिनके अपने मरे वो घर से निकल भी नहीं सकते थे क्योंकि गली में किसी को देखते ही गोली मारने के आदेश थे. सबसे बुरी बात तो ये कि जो घायल थे उन्होंने डर के मारे अस्पताल में जाकर इलाज नहीं कराया क्योंकि यदि ऐसा होता तो पुलिस को पता चल जाता कि अमुक व्यक्ति बाग के प्रदर्शन में मौजूद था. जलियांवाला पर कई किताबें हैं. उनमें से एक वीएन दत्ता की है. उसमें एक महिला रत्तन देवी की दारुण आपबीती लिखी है.

रत्तन देवी ने बताया कि कैसे वो बाग में चली गोलियों की आवाज़ सुनकर घबरा गईं. उनके पति भी वहीं गए थे. दो महिलाओं के साथ वो किसी तरह बाग में पहुंची तो सामने लाशों के ढेर दिखे. पड़ोस के लाला सुंदरदास के दो बेटे वहीं थे. रत्तन देवी ने उन्हें चारपाई लाने को कहा ताकि पति की लाश ले जा सके. वो दो महिलाएं भी चली गईं. तब तक रात के आठ बज गए. कर्फ्यू जारी हो गया. अंधेरा घिर आया. लाश तो मिली लेकिन ले कर जाएं कैसे. खून से पूरी ज़मीन पर कीचड़ हो गया था. थोड़ी देर में एक सिख आदमी वहां पहुंचा जिससे रत्तन बाई ने गुहार लगाई कि किसी तरह इस लाश को सूखी ज़मीन पर रखवा दें. रात दस बजे तक कोई भी बाग में नहीं लौटा तो लाचार रत्तन बाई मदद की तलाश में बाहर निकलीं. निराश होकर फिर लौट आईं क्योंकि डर था कि कहीं जानवर लाश ना खा जाएं. पूरे शहर की बिजली और पानी अलग कटे हुए थे. रत्तन बाई पूरी रात पति के निर्जीव शरीर के पास एक लकड़ी लिए बैठी रहीं जिससे खाने की तलाश में आए कुत्तों को दूर भगा सकें. उन्होंने पूरी रात वहां पड़े घायलों की आवाज़ें सुनीं. बारह साल का एक घायल लड़का भी वहीं पड़ा था जिसने रत्तनबाई को उसे छोड़कर न जाने की विनती की. बेचारे ने पानी मांगा लेकिन वहां कहां पानी था. वो सुनसान रात रत्तनबाई ने घायलों की कराह, कुत्तों- गधों की आवाज़ें और घड़ियाल की घंटियां सुनते हुए किसी तरह काटी. सुबह छह बजे चारपाई लेकर लड़के पहुंचे तब वो बाग से जा सकीं.

ऐसी हैवानियत पर ब्रिटेन में वो चर्चिल तक शर्मिंदा थे जिन्होंने कभी भारतीयों को इंसान तक नहीं माना. इसी जलियांवाला का असर था जिसने गांधी का नज़रिया अंग्रेज़ों को लेकर बदला, भगत सिंह को क्रांति की राह पर ला खड़ा किया, उधम सिंह को लंदन जाकर पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर रहे माइकल ओडायर की हत्या पर मजबूर किया. इसी जलियांवाला बाग में गोलियों की बौछार के बीच एक बाइस साल का लड़का भी खड़ा था. पड़ोस में ही उसका घर था. दो दोस्तों को उसने अपने सामने मरते देखा. खुद भी भगदड़ के दौरान लाशों के बीच गिरकर बेहोश हो गया. जब डायर लौटा तो किसी तरह बाग से निकलकर वो बेसुध अपने घर पहुंचा. आगे चलकर उसका नाम पंजाबी लिटरेचर में खूब सुना गया. वो नानक सिंह नॉवेलिस्ट के नाम से पहचाना गया लेकिन जो कुछ जलियांवाला में उस शाम उसने महसूस किया वो कभी किसी से नहीं कहा. हां, एक कविता ज़रूर लिखी थी खूनी वैसाखी. वो कविता अंग्रेज़ों ने बैन कर दी. बाद में कड़ी मशक्कत के बाद नानक सिंह के वंशजों ने खोजी और छपवाई जिसकी कहानी बहुत दिलचस्प है. पंजाबी में लिखी गई ये कविता मेरे फेसबुक के दोस्त Harpreet Singh ने कंपोज़ की है. उसकी एक एक लाइन आपको जलियांवाला बाग के उसी वक्त में ले जाती है.

मैंने पढ़ाकू नितिन में उन्हीं नानक सिंह के पोते नवदीप सिंह सूरी से बात की है. सूरी साहब ने छत्तीस सालों तक इंडियन फॉरेन सर्विसेज़ में सेवा दी है. बाद में अपने दादा की किताबों को अनूदित करके छपवाने के बड़े अहम काम में लग गए. उनकी मुलाकात उन सिडनी रौलेट के पड़नाती से भी हुई जिनके बनाए कानून का विरोध करते हुए जलियांवाला में सैकड़ों लोग होम हो गए. इस पॉ डकास्ट में मैंने उनसे एक एक बात पूछी और उन्होंने खुलकर सब कहा भी. जिन लोगों को लगे कि उन्हें ये बातें सुननी चाहिए वो कमेंटबॉक्स में लिंक पा लेंगे.

नितिन ठाकुर

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