हमारी आजादी रक्षक के इंतजार में है! नागरिक बनाम राज्य बनाम आजादी
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पी. चिदंबरम

मैं समझता हूं कि मैं आजाद पैदा हुआ था। मेरा जन्म वेस्टमिंस्टर जैसे लोकतंत्र या सोवियत शैली वाले देश या पूर्ण तानाशाही या एक अशांत, संघर्षरत देश में हुआ, यह ऐसा विषय था, जिस पर मेरा नियंत्रण नहीं था।

मेरा मानना है कि मेरा जन्म कुछ निश्चित अहस्तांतरणीय अधिकारों के साथ हुआ था। जिनमें मेरे शरीर पर अधिकार, आजादी के साथ घूमने का अधिकार, अपनी बात कहने और लेखन शक्ति के प्रयोग का अधिकार, अपने साथियों का संगठन बनाने का अधिकार और अपने और परिवार के लिए दिए गए काम को करने का अधिकार शामिल हैं।

नागरिकों के लिए राज्यएक सामूहिक नाम से ज्यादा कुछ नहीं है, जिसे वे अपने को संगठित करने और एक राज्यगठित करने के लिए चुनते हैं। जब नागरिक अपने को एक संहिता से संबद्ध कर लेते हैं, तो वह राज्य का संविधान बन जाता है। संविधान में जो लिखा है, राज्य उससे परे जाकर किसी भी अधिकार, शक्ति या कर्तव्य पर कोई अधिकार नहीं जता सकता। जो नागरिक संविधान में विश्वास नहीं रखता है, वह देश छोड़ सकता है और किसी दूसरे देश का नागरिक बन सकता है, अगर वह देश उसे स्वीकार कर ले।

पूरी तरह विवेकपूर्ण व्यवस्था

सामान्य रूप से पूरी तरह तार्किक इस व्यवस्था में राज्य और नागरिकों को मिल कर रहने वाला होना चाहिए। बाधा निम्नलिखित में आती है-

संविधान में जो लिखा है, कई बार उसका अर्थझगड़े की जड़ बन जाता है और फिर उसके बाद व्याख्या। संविधान की व्याख्या करने का अधिकार न्यायपालिका (न्यायिक शक्तियों की एकमात्र संस्था) का है, लेकिन उसके सामने विधायिका खड़ी हो गई है, सिर्फ उसी के पास कानून बनाने की शक्तियां हैं। जज नियुक्त तो किए जाते हैं, पर उन्हें नियुक्त करने का अधिकार सामान्य तौर पर सरकार के पास ही रहता है।

इस व्यवस्था में ऐसे भी मौके आएंगे, जब एक लिखे हुए शब्द और इसके अर्थ को लेकर विवाद उत्पन्न हो सकता है। ऐसे भी अवसर आएंगे जब विधायिका और न्यायपालिका के बीच असहमति की नौबत आ जाए। यही ऐसी असहमतियों का समाधान है, जो एक परिपक्व, सभ्य देश को दूसरों से अलग करता है।

ऐसा ही एक मौका अमेरिका में 1973 में आया था। जज लोगों के साथ खड़े थे और गर्भपात के मसले पर महिलाओं का निजता का अधिकार बनाए रखा था (रोए बनाम वेड)। ऐसा ही मौका 1976 में भारत में आया। जज तबकी सरकार के साथ थे और जीवन के अधिकार सहित सभी मौलिक अधिकार खत्म कर दिए थे (एडीएम जबलपुर बनाम एसएस शुक्ला)।

संविधान को बचा लें या दफना दें

रोए बनाम वेड मामले में सवाल यह था कि क्या किसी राज्य को यह कानून बनाने का अधिकार है, जो किसी मां को अपने भ्रूण का गर्भपात करवाने के अधिकार से वंचित करता हो। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि संविधान में व्यक्तिगत निजता का अधिकार मौजूद है और इस अधिकार में व्यापक रूप से यह बात शामिल है कि महिला अपनी मर्जी से गर्भपात करवाए या नहीं।

हालांकि राज्य के हितों के खिलाफ महिला के अधिकार को संतुलित करते हुए अदालत ने व्यवस्था दी कि पहली तिमाही के अंत तक के मामले में अधिकार अलग-अलग हैं, और पहली तिमाही के अंत से लेकर भ्रूण के परिपक्व होने की अवधि तक और भ्रूण की व्यवहार्यता से लेकर जन्म की अवधि तक के अधिकार अलग-अलग हैं।

रोए बनाम वेड फैसले ने अमेरिकियों को बांट दिया था। इससे पहले किसी फैसले को लेकर ऐसा विभाजन नहीं हुआ था, जब तक कि डोनाल्ड ट्रंप नहीं आ गए। उन्होंने कई मुद्दों पर अमेरिकी जनता को बांट दिया था। इस बात की संभावना है कि अगर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट रोए बनाम वेड मामले की फिर से समीक्षा करे, तो अमेरिकी समाज कड़वाहट के साथ और ज्यादा विभाजित हो जाएगा।

एक लंबित मामले में अदालत के बहुमत के फैसले का पहला मसविदा, जो लीक हो गया था, उसमें कहा गया था कि रोए बनाम वेड फैसला रद्द होना चाहिए। इस लीक दस्तावेज के अनुसार रोए बनाम वेड मामले में फैसला भयंकर रूप से गलत था और इसके तर्क अपवादस्वरूप बेहद कमजोर थे और यह फैसला गंभीर नतीजों वाला था।

अगर रोए बनाम वेड फैसला सही में खारिज कर दिया जाता, तो संतति नियंत्रण और समलैंगिक विवाह के लिए इसके नतीजे काफी अहम होते। यही अदालत की ताकत है, जो आजादी को विस्तार देती या सीमित करती है।

राष्ट्र को इंतजार है

भारत के सुप्रीम कोर्ट में कई मुकदमे लंबित पड़े हैं, जो आजादी से जुड़े हैं। इनमें से कुछ ये हैं-

विमुद्रीकरण का मामला : क्या राज्य बिना नोटिस के छियासी फीसद मुद्रा का विमुद्रीकरण कर लाखों लोगों को कुछ दिन के लिए खाने और दवाइयों से वंचित कर सकता है?

चुनावी बांड मामला : क्या राज्य ऐसा कानून बना सकता है, जो उद्योग जगत (जिनमें घाटे वाली कंपनियां भी शामिल हैं) को राजनीतिक दलों को बेनामी और असीमित दान देने का अधिकार देता हो और कुशलता के साथ क्रोनी पूंजीवाद, भ्रष्टाचार और सत्तारूढ़ पार्टी को दान का रास्ता साफ करता हो?

पूर्णबंदी : क्या राज्य लोगों को बिना नोटिस दिए पूर्णबंदी लागू कर सकता है और करोड़ों लोगों को बिना घर, खाना, पानी, दवा, पैसे और अपने स्थायी ठिकाने तक पहुंचने के लिए यात्रा के संसाधनों के बिना छोड़ सकता है?

संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय करना : क्या राज्य किसी प्रदेश को, जो इंस्ट्रूमेंट आफ एक्सेशन (विलय का दस्तावेज) के तहत केंद्र में शामिल हुआ था, उसे लोगों या राज्य विधानसभा की सहमति लिए बिना दो उप-राज्य इकाइयों में बांट सकता है?

राजद्रोह : क्या राज्य आइपीसी की धारा 124 के तहत उन लोगों पर राजद्रोह के मुकदमे थोप सकता है, जो उसकी गतिविधियों का विरोध करते हों या उसका मखौल उड़ाते हों?

मुठभेड़ें और बुलडोजर : क्या राज्य असहमति रखने वालों या विरोध करने वालों के खिलाफ मुठभेड़ या ध्वस्तीकरण जैसे तरीके अख्तियार कर सकता है?

भारत राज्य की बुनियादों पर जानबूझ कर और प्रतिबद्धता के साथ हमले की कोशिशें की जा रही हैं। लोगों को उनकी स्वतंत्रता और अहस्तांतरणीय अधिकारों से वंचित करने की यह भारी कोशिश है। वैश्विक प्रेस आजादी सूचकांक में भारत एक सौ अस्सी देशों में से एक सौ पचासवें स्थान पर आ गया है। जागरूक नागरिक जो खुद को सतर्क पहरेदार होने का दावा करते हैं, सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा चुके हैं। आजादी रक्षक के इंतजार में है।

[इंडियन एक्सप्रेस में अक्रॉस दि आइलनाम से छपने वाला, पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता, पी चिदंबरम का साप्ताहिक कॉलम। जनसत्ता में यह दूसरी नजरनाम से छपता है।

हिन्दी अनुवाद जनसत्ता से साभार।

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