प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतंत्र
t

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (आरएसएफ) द्वारा जारी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत इस बरस 150वें नंबर पर आया है। पिछले साल भारत इसमें 142वें नंबर पर था। मतलब गोदी मीडिया ने अपने लिए आठ अंक और हासिल कर लिए हैं। प्रेस स्वतंत्रता में हम जितनी गिरावट देखते जाएंगे, ये तय जानिए कि देश में कुछ मीडिया घरानों और बड़े पत्रकारों का रुतबा और दौलत बढ़ता जाएगा।प्रधानमंत्री और भाजपा के मुख्यमंत्रियों के आगे पत्रकारों को झुक कर सलाम करते तो देखा ही गया है, कुछ दिनों में चरण धोकर पीने की तस्वीरें भी सार्वजनिक हो जाएं, तो आश्चर्य नहीं है।

ये बातें अतिरंजना में नहीं लिखी जा रहीं, बल्कि यही हकीकत है। उत्तरप्रदेश चुनावों के वक्त देश ने देखा है कि किस तरह गैरभाजपाई दलों को कवरेज दी जाती थी और कैसे भाजपा के लिए मंच सजाया जाता था। एक बड़े न्यूज़ चैनल की कवरेज बस को खुद आदित्यनाथ योगी ने झंडी दिखाकर रवाना किया था। क्या चुनाव या अन्य किसी भी मौके पर इस तरह रिपोर्टिंंग की जाती है। अगर इसे पत्रकारिता कहा जाएगा, तो फिर उसमें निष्पक्षता और पारदर्शिता कहां रह जाएगी। और फिर किस तरह प्रेस की स्वतंत्रता बरकरार रह पाएगी।

प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में गिरावट की ख़बर को भी बहुत से चैनल ने इस तरह पेश किया कि इत्तला भी हो जाए और सरकार को बुरा भी न लगे। कई चैनलों ने बताया कि अगर हमारा नंबर 150वां है, तो हमसे नीचे हमारे पड़ोसी देश हैं। नेपाल को छोड़कर, श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश सब जगह हमसे बुरा हाल है। इन चैनलों को न जाने क्यों जर्मनी या डेनमार्क नजर नहीं आए, जो इस सूची में हमसे बहुत ज्यादा आगे हैं और अभी इन देशों की यात्रा प्रधानमंत्री ने की है।

यह संयोग ही है कि 3 मई को जब विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा था, उस वक़्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जर्मनी में थे। भारत और जर्मनी के बीच 14 समझौतों पर दस्तख़त हुए और इनकी घोषणा के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जर्मनी के चांसलर ओलाफ श्कोल प्रेस के सामने आए। दो विश्व नेताओं से रूस-यूक्रेन युद्ध और इन समझौतों पर सवाल करने के लिए दुनिया भर के पत्रकार इंतजार कर रहे थे, लेकिन उन्हें यह सुनकर निराशा हुई कि प्रेस कान्फ्रेंस में सवाल-जवाब नहीं होगा।

जर्मन विदेश प्रसारण सेवा डॉएचे वेले के संपादक रिचर्ड वाल्कर ने इस बारे में ट्वीट कर बताया है कि भारतीय अधिकारियों के आग्रह पर दोनों राष्ट्रप्रमुखों से सवाल करने की इजाज़त नहीं दी गई। इस बारे में समाचार एजेंसी रायटर्स ने यह भी याद दिलाया है कि पिछले आठ सालों में 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से मोदीजी ने एक भी प्रेस कान्फ्रेंस नहीं की है। हालांकि यह पहली बार नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी की इस बात को लेकर आलोचना हुई हो कि उन्होंने कभी पत्रकारों के सीधे सवाल लेने की हिम्मत दिखाई हो। लेकिन अब चुनाव-दर-चुनाव जीतती आ रही भाजपा को इस तरह की आलोचनाओं से कोई फर्क नहीं पड़ता है।

भाजपा जानती है कि प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक जैसी बातें उसकी चुनावी रणनीतियों में कभी बाधा नहीं बन सकती हैं। देश के बड़े मीडिया घराने सरकार के साथ हैं। सोशल मीडिया पर भाजपा की आईटी सेना मजबूत है। और इन दोनों के बूते जनमानस को कैसे प्रायोजित मुद्दों में उलझाए रखना है, यह भी सरकार खूब जानती है।इसलिए सरकार इस बारे में फिक्रमंद नहीं है कि देश में अगर मीडिया की साख गिरेगी, प्रेस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे बढ़ेंगे, तो लोकतंत्र कैसे बचेगा। क्योंकि एक स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र के लिए सशक्त विपक्ष के साथ-साथ स्वतंत्र प्रेस भी ज़रूरी है। कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका, लोकतंत्र के इन तीनों स्तंभों के साथ मीडिया को चौथा स्तंभ बना दिया गया है। लेकिन असल में इसे चौथा स्तंभ न बनकर इन तीनों पर एक समान निगाह रखने का काम करना चाहिए। तभी लोकतंत्र के तीनों अंग और उनके साथ मीडिया अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए शक्ति संतुलन बनाए रखेंगे।

सरकार लोकतंत्र की इस व्यवस्था का ख़्याल रखे या न रखे, जनता को तो इस बारे में जागरुक होना ही चाहिए। प्रेस की स्वतंत्रता गिरने का सीधा मतलब ये है कि जनता तक सही सूचनाएं नहीं आ रही हैं। उसे भ्रामक खबरों और गढ़े हुए मुद्दों में गुमराह किया जा रहा है। पहले टीवी चैनलों पर नागिन, एलियन, चमत्कार और रहस्य-रोमांच की खबरों से जनता का मनोरंजन किया जाता था, फिर अपराध, क्रिकेट और सिनेमा बिकने लगा और इन दिनों युद्ध बेचा जा रहा है। रोज़ परमाणु हथियारों के इस्तेमाल और दुनिया खत्म होने के खतरे टीवी पर बताए जा रहे हैं, जिस पर सरकार ने आगाह किया है कि आपत्तिजनक भाषा, भ्रामक खबरों और भड़काऊ शीर्षक न दिए जाएं।

लेकिन टीआरपी बढ़ाने की होड़ और सनसनीखेज खबरें परोसने की लत इतनी जल्दी नहीं छूटेगी। इस आदत को दूर करने का एक ही उपाय है कि जनता खुद ऐसे खबरिया चैनलों से दूरी बना ले, जो उसके पैसे और समय को बर्बाद कर उसे सही ख़बरें हासिल करने से रोक रही है। यही बात ख़बर हासिल करने के अन्य माध्यमों पर भी लागू होती है। जनता खुद विश्लेषण करे कि उसकी ज़रूरतों और हितों से जुड़ी कितनी खबरों को स्थान मिलता है और सरकार के प्रचार-प्रसार को कितना हिस्सा दिया जाता है। जब जनता जागरुक हो जाएगी, तो प्रेस पर लगी गिरहें भी खुलने लगेंगी।

Share this story