सुप्रीम कोर्ट में सेडिशन धारा 124A आईपीसी की सुनवाई
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सुप्रीम कोर्ट में धारा 124A आईपीसी पर बहस जारी है। केंद्र सरकार ने इस सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा देकर कहा है कि, सरकार इस प्राविधान पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार है। सरकार की इस दलील पर पीठ ने कहा है कि जब तक सरकार, इस विषय पर विचार नहीं कर लेती, तब तक के लिए, केन्द्र सरकार, राज्यों को यह निर्देश क्यों नहीं जारी कर देती कि वे इस धारा के अंतर्गत मुकदमे न लिखे। इस पर अभी सरकार का दृष्टिकोण सामने नहीं आया है।

सेडिशन मामले में केदार नाथ बनाम बिहार राज्य का मुकदमा और उस पर पांच जजों की पीठ का फैसला मील का पत्थर है। सुप्रीम कोर्ट में फिलहाल जो पीठ इस मुकदमे की सुनवाई कर रही है वह तीन जजों की है। यह भी विंदु अदालत के सामने है कि, क्या किसी मामले में पांच सदस्यीय पीठ द्वारा सुने गए और निपटाए गए मामले को तीन सदस्यीय पीठ सुन सकती है ? बहस इस पर भी चल रही है।

केदार नाथ बनाम बिहार राज्य के मामले में 1962 की संविधान पीठ के फैसले में, राज्य और सरकार के बीच की स्थिति को अस्पष्ट रखा गया है। राज्य और सरकार को एक ही माना गया है। इससे यह भ्रम हो जाता है कि सरकार का विरोध, राज्य के प्रति द्रोह है।

10 मई , मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने, संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली इस याचिका की तरफ से अदालत में कहा

"केदार नाथ संघीय अदालत (फेडरल कोर्ट जो ब्रिटिश राज के अधीन गठित थीं) के फैसलों पर आधारित है, जो संविधान से पहले के हैं। संविधान से पहले, सरकार और राज्य के बीच कोई अंतर नहीं होता था। एक गणतंत्र बनने के बाद, सरकार और राज्य के बीच अंतर है। केदार नाथ निर्णय में कहा गया था कि "कानून द्वारा स्थापित सरकार" राज्य का प्रत्यक्ष प्रतीक है।  यदि कानून द्वारा स्थापित सरकार को उलट दिया जाता है तो राज्य का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।  इसलिए, कानून द्वारा स्थापित सरकार का निरंतर अस्तित्व राज्य की स्थिरता के लिए एक अनिवार्य शर्त है। जहां तक ​​केंद्र के इस रुख का संबंध है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और देश की संप्रभुता और अखंडता के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए प्रावधान की फिर से जांच की जानी चाहिए। यह धारा राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता से संबंधित नहीं है।"

कपिल सिब्बल आगे कहते है,

"124ए में राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता का कोई जिक्र नहीं है। यह कानून सरकार के खिलाफ नफरत या असंतोष को दंडित करता है। यह कानून एक पूर्व-संवैधानिक कानून है जहां राज्य और सरकार एक थी।

महात्मा गांधी पर चले 124A आईपीसी के मुकदमे का उल्लेख करते हुए कहा कि,

"महात्मा गांधी ने भी कहा था कि, सरकार और राज्य में अंतर होता है।"

कपिल सिब्बल ने उक्त मुकदमे में गांधी द्वारा दिए गए बयान को भी पढ़ा,

"धारा 124ए आईपीसी भारतीय दंड संहिता की राजनीतिक धाराओं में सबसे चहेती धारा है, जिसे नागरिकों की स्वतंत्रता को दबाने के लिए, ब्रिटिश सरकार द्वारा गढ़ा गया है। कानून द्वारा, किसी में स्नेह, लगाव या प्रेम नहीं उपजाया जा सकता है। यदि किसी को किसी व्यक्ति या व्यवस्था के लिए, अंतरात्मा से कोई स्नेह या लगाव नहीं है तो, उसे व्यक्ति को उस व्यवस्था से स्वतंत्र होने की बात कहने का अधिकार होना चाहिए, जब तक कि वह व्यक्ति हिंसा के माध्यम से, प्रचार या उकसाने का विचार नहीं करता है। उसे अहिंसक रूप से बिना उकसावे की बात किए, अपनी नाराजगी, पूरी तरह से जताने का अधिकार है। लेकिन जिस धारा के तहत मिस्टर बैंकर और राज्य द्वारा मुझ पर आरोप लगाया गया है, वह वह धारा है जिसके तहत केवल असंतोष को व्यक्त करने को अपराध माना गया है। मैंने कानून का अध्ययन किया है। इस धारा के तहत कुछ मामलों की पड़ताल भी की है। मुझे पता है कि भारतीय देशभक्तों में से कुछ को पहले भी (यह वे लोकमान्य तिलक के संदर्भ में कह रहे हैं) इसके तहत दोषी ठहराया गया है। मैं इसे एक विशेषाधिकार मानता हूं, इसलिए, उस धारा के तहत आरोप लगाया जाना ..."

कपिल सिब्बल ने नेहरू को यह कहते हुए उद्धृत किया कि,

"यह प्रावधान अप्रिय है। जितनी जल्दी हम इससे छुटकारा पा लें, बेहतर है। इसमें कोई जगह नहीं होनी चाहिये।"

इस दलील पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि,

"सरकार वह करने की कोशिश कर रही है जो नेहरू नहीं कर सके।"

कपिल सिब्बल ने केंद्र के इस रुख पर भी आपत्ति जताई कि, जब तक वह प्रावधान की समीक्षा नहीं कर लेता, तब तक अदालत को सुनवाई टालनी चाहिए। उन्होंने कहा,

"इस न्यायालय की कवायद को केवल इसलिए नहीं रोका जा सकता क्योंकि विधायिका को 6 महीने या 1 साल के लिए पुनर्विचार करने में समय लगेगा। मैं केंद्र के हलफनामे पर कड़ी आपत्ति लेता हूं। यह न्यायपालिका के लिए कानून की संवैधानिकता की जांच करना है।"

उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि

" इस अवधि के दौरान इस धारा के तहत प्राथमिकी दर्ज नहीं होनी चाहिए।"

भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने सुनवाई कल तक के लिए स्थगित कर दी और केंद्र से पूछा कि क्या सरकार द्वारा समीक्षा प्रक्रिया पूरी होने तक आईपीसी की धारा 124ए के तहत मामलों का पंजीकरण निलंबित किया जा सकता है। सुनवाई जारी है।

(विजय शंकर सिंह)

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