शाहीन बाग: नाइंसाफ़ी का बुलडोज़र देश में कबतक!
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दिल्ली का शाहीन बाग इलाका एक बार फिर लोकतंत्र में जनता की ताकत का गवाह बना। अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के नाम पर दिल्ली नगर निगम का दस्ता बुलडोजर लेकर शाहीन बाग पहुंचा, लेकिन उसे बैरंग वापस लौटना पड़ा। बुलडोजर पहुंचने के बाद स्थानीय नागरिकों ने विरोध प्रदर्शन किया। स्थानीय नागरिकों के प्रदर्शन के बाद बुलडोजर कार्रवाई नहीं हो पाई और एमसीडी की टीम को वापस लौटना पड़ा। लोग बुलडोजर के आगे बैठ गए और एमसीडी के खिलाफ नारे लगाए। एक स्थानीय बाशिंदे ने तो साफ़ कहा कि ये कुछ नहीं है, बस सरकार लोगों में दहशत फैलाने की कोशिश कर रही है, खासकर अल्पसंख्यक समाज के लोगों में। हम सरकार से डरते नहीं हैं लेकिन हम कानून के दायरे में काम करना चाहते हैं। बुलडोजर दिखाकर अल्पसंख्यक इलाकों को निशाने पर लिया जा रहा है, वो देश का माहौल ख़राब करना चाहते हैं। ये भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस की सोच है। इसी तरह शाहीन बाग के रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ने दक्षिणी दिल्ली नगर निगम के अतिक्रमण हटाने के अभियान को गलत बताते हुए कहा है कि यहां कुछ भी अवैध नहीं था। यहां सिर्फ़  एक बिल्डिंग पर बांस बल्ली लगी हुई थी पेंटिंग के लिए। हमने ख़ुद वो बांस बल्ली हटा ली। यहां कुछ भी अवैध नहीं है। शाहीन बाग में बुलडोजर का मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई न करते हुए याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट जाने की सलाह दी है।

पाठक जानते हैं कि दो साल पहले इसी शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ महिलाओं ने घरों की चौखट से बाहर निकल कर प्रदर्शन करने का फैसला लिया और मुस्लिम महिलाओं का ये आंदोलन लोकतांत्रिक विरोध की नयी पहचान बन गया। देश में जगह-जगह शाहीन बाग की तर्ज पर आम महिलाओं ने संविधान और अपने बच्चों के भविष्य की रक्षा के लिए प्रदर्शन किए। उस वक्त अगर कोरोना का कहर न टूटा होता, लॉकडाउन न लगा होता और लोग घरों में कैद रहने को मजबूर न किए जाते तो शायद वह आंदोलन अपने अंजाम तक पहुंचता, देश की सूरत कुछ और होती। लेकिन कोरोना के कारण आंदोलन बीच में ही खत्म हो गया। इसके बाद किसान आंदोलन ने शासन के मनमाने फैसलों के ख़िलाफ़ विरोध करने का जज़्बा लोगों को सिखाया। चुनावों के पहले सरकार को कृषि कानून वापस लेने का ऐलान करना पड़ा और किसान दिल्ली की सीमाओं से हटे। अब एक बार फिर छोटे स्तर पर ही सही, लेकिन फिर शाहीन बाग में लोगों ने संगठित होकर, कानून और संविधान का सम्मान करते हुए विरोध किया और उन्हें सफलता मिली है।

इन उदाहरणों से बार-बार यही सबक याद होता है कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है और सरकारें जब जनता के हितों की जगह स्वार्थसिद्धि में लग जाती हैं तो जनता ही उसे ग़लती का अहसास कराती है। हमने यह पहले भी लिखा है कि अवैध कब्जे या निर्माण को हटाना ग़लत नहीं है, लेकिन जब इसमें यह नज़र आए कि एक खास समुदाय को परेशान या प्रताड़ित करने की नीयत से ऐसा किया जा रहा है, तो फिर यह ग़लत है। देश की राजधानी दिल्ली में कई आलीशान रिहायशी इलाकों में अवैध कब्जे किए गए हैं, मगर रसूखदारों की चौखट तक बुलडोजर पहुंचता हो, ऐसी ख़बर सुनने-देखने नहीं मिलती। दरअसल मौजूदा राजनैतिक दौर में बुलडोजर सत्ता के आतंक का प्रतीक बना दिया गया है। जबकि लोकतंत्र में जनहितकारी प्रतीकों की जरूरत है, आतंक के नहीं।

शाहीन बाग जैसी ही मिसाल महाराष्ट्र के सोंडेघर गांव से सामने आई है। रत्नागिरी जिले के इस छोटे से गांव में 400 मुस्लिम, 400 हिंदू और 200 बौद्ध लोगों की आबादी है। यहां कभी सांप्रदायिक माहौल ख़राब नहीं हुआ है और अब अगले सौ साल तक भी आपसी प्रेम और भाईचारे का माहौल बना रहे, इसके लिए सारे गांव वालों ने एक समझौता किया है और इस समझौते का प्रतीक एकता संधि का बोर्ड सोंडेघर ग्राम पंचायत ने गांव के बाहर लगा दिया है। गांव के सरपंच का कहना है कि अगर गांव में शांति रहेगी तो गांव का विकास होगा। गांव के बाकी लोग भी इस बात से सहमत हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि बेरोजगारी या अन्य समस्याओं से तभी निपटा जा सकेगा, जब आपस में एकता रहेगी।

इस वक्त देश में जगह-जगह से सांप्रदायिक विवाद खड़े करने की साजिशें सामने आ रही हैं। इसी महाराष्ट्र में अजान बनाम हनुमान चालीसा का विवाद खड़ा किया गया है। जो अब देश के कई राज्यों में फैल चुका है। कहीं अजान, कहीं हिजाब, कहीं खुले में नमाज़ को लेकर जानबूझ कर अल्पसंख्यक समुदाय को निशाने पर लिया जा रहा है। दलितों के साथ भेदभाव में कड़े कानूनों के बावजूद सवर्ण दबंगों के अत्याचार कम नहीं हो रहे हैं। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक बड़ी आबादी आश्वस्त नहीं है। बेरोज़गारी का कोई हल नहीं निकल रहा है, महंगाई चरम पर है और रुपया एक डॉलर के मुकाबले 77 से भी नीचे चला गया है। कहने का अर्थ ये कि देश में कई किस्म के संकट सामने खड़े हैं, जिनसे निपटना सरकार की प्राथमिकता होना चाहिए। मगर इसकी जगह विवादों को तूल दिया जा रहा है या लोगों की परेशानी बढ़े, ऐसे फैसले लिए जा रहे हैं। इन हालात में जनता को ही हक औऱ न्याय के लिए खड़ा होना होगा और अपनी एकता से नाइन्साफी के बुलडोजर को पीछे हटाना होगा।

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