कश्मीर में पंडितों के कत्लेआम का सच!
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आधुनिक भारतीय इतिहास में, ये शोर सबसे सफल प्रोपगंडा रहा है। मजे की बात यह है कि इसका जवाब कांग्रेस से मांगा जाता है। कुछ यूं हुआ कि आप पूछे-  बताओ, राम ने कंस को क्यूं मारा था??

जबकि कंस के दौर में राम थे ही नही।

खैर, यह सवाल पूछा और जवाब दिया जाता है तो भाजपा कांग्रेस बाइनरी, और पर दोषारोपण-डिफेंस की प्रतियोगिता शुरू हो जाती है। किसी गुत्थी के अंत मे जरूर भाजपा-कांग्रेस पर आइये, लेकिन शुरू तो शुरू से ही कीजिए। वहां से, जब सृष्टि का निर्माण हो रहा था।

तो सृष्टि से पहले जब, भाजपा नही थी, कांग्रेस भी नही थी, तब कश्मीर में एक मुस्लिम कांफ्रेंस थी। उस दौर में राजा का राज था। राजा निहायत नालायक था। उसके बाप दादों ने इलाके को 75 लाख में अंग्रेजो से खरीदा था। जो ओवरप्राइज था।

ये 75 लाख रुपये प्लस राजा का कमीशन, कश्मीर की जनता से वसूला जाना था। तो यहां टैक्स बड़े हैवी थे, बड़ी कडाई से वसूले जाते। राजा हिन्दू था, रैयत मुसलमान। राजा बाहरी था, ज्यादातर कारिंदे हिन्दू थे। तो हिन्दू ही सोसायटी के पावरफुल और रिच थे।

रिच पावरफुल- और गरीब के बीच एक नफरत का रिश्ता होता है। पर यहां हिन्दू मुस्लिम का एलिमेंट भी एवलेबल था। लेकिन अभी इसका फायदा उठाने को आरएसएस नही था।

अभी तो था शेख अब्दुल्ला, जो अंग्रेजो के चमचे राजा के विरुद्ध आंदोलन कर रहा था। यही काम शेष भारत मे कांग्रेस कर रही थी। तो नेहरू और शेख की मुलाकात हुई।

नेहरू से प्रभावित शेख ने अपनी मुस्लिम कांफ्रेस का नाम बदल दिया। वो अब सेकुलर, नेशनल कांफ्रेंस हो गयी। तमाम राजा विरोधी हिन्दू बुद्धिजीवी भी इसकी लीडरशिप में शामिल हो गए।

शेख की अगुआई में एक सेकुलर, लोकप्रिय कश्मीरवादी सन्गठन बन गया।

शेख की दोस्ती वो ब्रह्मास्त्र थी, जिसकी वजह से, कल को रेफरेंडम होने पर कश्मीरी जनता द्वारा भारत के पक्ष में वोट करने का यकीन, नेहरू को था।

तो पाकिस्तानी आक्रमण की छाया में लुटे पिटे कश्मीर का भारत मे एक्सेशन हुआ। भारत सरकार के दबाव में शेख अब्दुल्ला कश्मीर राजा के प्रधानमंत्री बने।

लेकिन फ़्यूडल किंग और जनपक्षी वजीर के बीच ज्यादा बनी नही। राजा ने अब्दुल्ला को हटाकर अपनी मनमर्जी का मंत्री बना लिया। 370 के तहत इसका हक राजा को था। अब नेहरू ने 370 को उधेड़ना शुरू किया। राजा के अधिकार कटे।

लेकिन ये तो कश्मीर की भी स्वायत्तता में कटौती थी।

कश्मीर के अधिकार कटे, तो शेख ने भी चूं चपड़ की। क्रूर नेहरू ने शेख को जेल डाल दिया। एक दो नही, पूरे बारह साल। और पीछे से पूरे 370 को उधेड़ कर कश्मीर का भारतीयकरण कर दिया। लेकिन भारत के वादे की रक्षा के लिए कुछ नॉमिनल खिलौने छोड़ दिये गए। वही खिलौने, जिन्हें अभी हाल में तोड़कर, हमने खूब जश्न मनाया।

तो कश्मीरी जनता देख रही थी। बेवकूफ तो न थी। लेकिन दिल हिंदुस्तान में लग चुका था, तो एडजस्ट कर लिया। 1947 में कश्मीर हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल रहा। 1965 में पाकिस्तान के ऑपरेशन ग्रेंड स्लैम को कश्मीरी जनता ने फेल किया।

70 के दशक में वहां मुम्बई के शम्मी कपूर जाकर " कश्मीरी जुल्फ का रंग सुनहरा" गाते रहे। 1981 तक अमिताभ ने "कितनी खूबसूरत ये तस्वीर है, ये कश्मीर है" का जाप लगाया।

लेकिन हाय रे राजनीति..

1982 में विधायक तोड़कर नेशनल कांफ्रेंस की सरकार गिरा दी गयी, और फारुख के जीजाजी सीएम बन गए। फिर नेशनल कांफ्रेंस से भारत सरकार  मेल मिलाप हो गया, तो फारुख फिर लौट आये। जीजाजी की कुर्सी गयी, वो जुस्सा हो गए।

अपनी अलग राजनीति की कोशिश की, इस्लाम के आधार पर। क्योकि अब भी कश्मीर में उच्च सरकारी पदों पर पण्डित ही चले आ रहे थे। गरीब तो मुसलमान था। तो पॉपुलिस्ट राजनीति और धर्म एक अच्छा कॉम्बिनेशन था।

उधर 1971 के जख्म सहला रहा पाकिस्तान, मौके की तलाश में था। जो मिला, 1987 के चुनाव में धांधली के आरोपो से। ऐसे निर्दलीय, या इस्लामी पार्टी के विपक्षी जिन्हें जीतना वैसे भी न था, धांधली से हराये जाने का आरोप लगाने लगे। ये आरोप पूर्ण असत्य भी न थे।

हारे हुए कुछ कैंडिडेट, पाकिस्तान चले गए। जेकेएलएफ बनाने वाला सय्यद सलाहुद्दीन भी उनमें एक था। मुट्ठी भर लोग, हथियार लेकर आए, और इंडियन गर्वनमेंट के ठिकाने उड़ाने लगे। स्कूलों में पुलिस और अर्धसैनिक बल अपना अस्थायी ठिकाना बनाते है, तो स्कूल उड़ाए। पुल उड़ाए।

जज, पुलिस, आईबी, रेडियो स्टेशन पर हमले किये। अफसरों को मारने लगे। घटनायें ऐसे तो सीमित थी, उसमे मुस्लिम अफसर भी शिकार हुए, हिन्दू भी। लेकिन इसे हिंदुओ की टारगेट किलिंग बताने और फायदा उठाने को अब RSS मौजूद था।

मौजूद थे टीकाराम टपलू। संघ के लोकल पुरोधा, हिन्दुओ के रक्षक, धमकी का जवाब धमकी। निगाह में आ गए। एक दिन किसी लड़की को 5 रुपये देने गए थे, वहीं हत्या कर दी गयी।

यह सितंबर की बात है। दिसम्बर आते आते वीपी सरकार आयी। आते साथ उनकी बेटी किडनैप हुई। इक्का दुक्का आतंकियों के आगे सरकार ने घुटने टेक दिये।

एक मकबूल बट था। बम ब्लास्ट का आरोपी, भारत की जेल में बन्द। उसके साथियों ने पाकिस्तानी एम्बेसी के एक अफसर को पकड़कर, मकबूल बट को छोड़ने की शर्त रखी थी। इंदिरा ने मान लिया।

गले मे फंदा लगाकर हवा में छोड़ दिया। मने फांसी दे दी, टंटा खत्म। पर इस बार वीपी ने टंटा खत्म न किया।

शुरू कर दिया।

कश्मीर का राज्यपाल, बड़ी खास जगह है। राजीव ने हॉट हेडेड जगमोहन को हटा दिया था। उनकी जगह गिरीशचन्द्र सक्सेना भेजे गए थे। अब भाजपा ने फिर से जगमोहन को भेजा। इसके विरोध में मुख्यमंत्री फारुख ने इस्तीफा देने की धमकी दी।

नेकी और पूछ पूछ?? इरादा बदले, इसके पहले फारुख का इस्तीफा ले लिया गया। राष्ट्रपति शासन लगाकर जगमोहन को खुल्ली छूट दे दी।

जाओ। लगाओ सबके होश ठिकाने..

जगमोहन जुट गए। आतंकी अब हर शांतिवादी को मार रहे थे। ऐसे ही एक थे मीरवाइज फारूक। बड़े नामचीन मुफ़्ती, जो आतंकवाद विरोधी थे, भारत का पिट्ठू बताकर उनकी हत्या कर दी गयी। बिगड़ती कानून व्यवस्था से आक्रोशित जनता की बड़ी भीड़ इकट्ठा हो गयी। पुलिस ने जनाजे पर गोली चला दी।

मीरवाइज के जनाजे में गोली चलाना, भारत के इस्लाम विरोधी होने के आतंकी प्रोपगेंडे की पुष्टि थी। जगमोहन की गलतियां रुकी नही। गांवकदल ब्रिज पर भी निहत्थे प्रदर्शनकारियों गोली चली, लोग मरे। कश्मीर के दूसरे जिलों में भी हालात बिगड़े।

जगमोहन दूसरी बार कश्मीर को टाइट करने भेजे गए थे। कुछ बड़ा होने वाला था। लेकिन इसके पहले घाटी के हिन्दू, सुरक्षित किये जाने थे।

19 जनवरी 1990 को कश्मीरी हिन्दू औऱ सिखों के "क़त्लेआम"तिथि बताई जाती है। कोई कत्लेआम तो नही हुआ था, पर इस दिन, और इसके कुछ पहले से , पैम्फलेट छाप अखबारों में, जेकेएलएफ ने पंडितों के लिए धमकियां छपवायी। कुछ दिनों तक आतंकियों ने मस्जिदों के लाउडस्पीकर से धमकियां दी। पैनिक फैला.. यह सही मौका था पंडितों को हटाने का।

तो कश्मीरी पंडितों को छह माह की एडवांस सैलरी देकर, सरकारी बसों में लादकर, अच्छी सुविधा का वादा करके सबको जम्मू लाया गया। शरणार्थी शिविरों में रखा गया।

कुछ बड़े के लिए रास्ता साफ था, कि एक और कैरेक्टर घुस गया।

जार्ज फर्नांडीज।

भारत का गृहमंत्री कश्मीर से था, राज्यपाल जगमोहन खुद राष्ट्रपति शासन चला रहे थे। लेकिन मामला बिगड़ता देख, एक और "कश्मीर मामलों का मंत्री" नियुक्त हुआ। ये फर्नाडीज थे। गए कश्मीर..

उन्हें लगा- दाल में काला है। वीपी से कह जगमोहन को तत्काल हटाया। इधर वीपी भी देवीलाल से परेशान थे। उन्होंने मंडल की तरफ राजनीति घुमा दी। जगमोहन हटे, तो संघी प्लान भी फेल हुआ। वो सब रथ लेकर मंदिर की तरफ निकल गए।

टेंटो में रह रहे लाखों कश्मीरी पंडित बर्बाद हो गए। जो सरकार उन्हें सुरक्षा देने की जगह बसों में बिठाकर भगा लायी, उसका भरोसा भी क्या करें।

तो जिंदगी नए सिरे से शुरू की। अधिकांश जम्मू या देश के दूसरे हिस्सों में सेटल हो गए। जड़ो से बिछड़ने की कसक है, पर कश्मीर के हालात सुधरे नही, तो वापस जाने की हिम्मत न की।

उनके दो चार सन्गठन है। उनकी मजबूरी और बेजारी बेचते हैं। अनुपम खेर जैसे नालायक भी है, तो राहुल पण्डिता जैसे मौकापरस्त भी। सब मिलकर कांग्रेस को गाली देते हैं।पूछते हैं- बताओ राम ने कंस को क्यों मारा..

कश्मीर अकेला मुस्लिम बहुल स्टेट था, जहां बंटवारे के अनहद हिन्दू मुस्लिम नफरत के दौर में, हिन्दुओ पर हमले की एक भी घटना न हुई। बहरहाल, 70 साल बाद यह कहना सच है कि कश्मीर में आज हिन्दू सुरक्षित नही है। इस बात में बहते हुए हम ये सोचना भूल जाते हैं कि..

मुसलमान वहाँ कौन सा सुरक्षित है??

कश्मीर काम्प्लेक्स ईशु है, बड़ा कन्फ्यूजिंग है। व्हाट्सप नही, प्रामाणिक पढ़ें। अशोक पांडेय साहब की किताब पढ़ने योग्य है। हालांकि,ये पोस्ट किताब पर आधारित नही।

पर सच, किसी भी एंगल से एक जैसा ही होता है।

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