यहूदी संग्रहालय (ज्यूइश म्युसियम) देखना आपकी भावनाओं का इम्तेहान है.
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बर्लिन में सबसे कठिन काम है; यहूदी संग्रहालय (ज्यूइश म्युसियम) देखना, एक-एक तस्वीर के नीचे लिखा सन्देश पढ़ना और वहाँ मौजूद ऑडियो सन्देश सुनना. इसके बगैर, लेकिन, फासीवाद को समझना मुकम्मल नहीं होता. इसलिए इतवार को ये काम कर डाला. बहुत मुश्किल काम था खुद को संभालना, कई बार चीख़ निकालते-निकालते रही लेकिन देखने, पढ़ने और सुनने से छूटा कुछ नहीं. हालाँकि कई लोग वहाँ खुद को संभाल नहीं पा रहे थे और बेंच पर बैठे सुबक रहे थे. पोस्ट लम्बी है, भले आप इसे लाइक ना करें लेकिन मेरा आग्रह है कि पढ़ें ज़रूर क्योंकि ऐसा लग रहा है कि हमारा देश इस अंधे, घिनौने, भयानक गटर में गिरने से ज्यादा दूर नहीं. वहाँ सारे सन्देश चूँकि जर्मन और अंग्रेजी में ही लिखे हुए हैं इसलिए मैं हिंदी अनुवाद लिख रहा हूँ.

ऐतिहासिक ब्रेदेनबेर्ग गेट और उसके साथ विशाल, भव्य, किलेनुमा अमेरिकी दूतावास और उसके साथ ही बनाया गया है, होलोकास्ट म्युसियम (प्रलय संग्रहालय). इसके दूसरी ओर हुआ करता था हिटलर का कुख्यात बंकर जिसे 1977 में लोगों को देखने से प्रतिबंधित कर दिया गया था और 1988 में उसमें मिटटी, कंक्रीट भरकर बंद कर दिया गया. उसी प्रलय संग्रहालय के एक अन्दर एक कोने पर अंडरग्राउंड यहूदी संग्रहालय (ज्यूइश मुसियम) बनाया गया है. प्रवेश निशुल्क है और वहाँ जाने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है. काफी लम्बी लाइन लगी हुई थी.

पहला सन्देश; ऐसा घट चुका है, आगे भी घट सकता है. यही उस बात का सार है जो हम कहना चाहते हैं.

जैसे ही राष्ट्रवादी समाजवादी’ (हिटलर की पार्टी) सत्ता में आई उसने यहूदियों का उत्पीडन शुरू कर दिया और उसे अपनी राष्ट्रिय नीति का हिस्सा बना लिया. अपने ही देश के नागरिकों के एक हिस्से को विदेशी कहा जाने लगा और ये उत्पीडन कदम-दर-कदम बढ़ता गया. क़ानून बनाकर, सरकार के समर्थकों को यहूदियों के ख़िलाफ़ हिंसा करने को भड़काकर और मीडिया को अपने नियंत्रण में लेकर इस काम को अंजाम दिया गया. एक के बाद एक, यहूदियों के अधिकारों को छीना जाने लगा. उदहारण के लिए 1935 में न्युरेम्बेर्ग क़ानून पारित होने के बाद यहूदियों और ग़ैर-यहूदियों में शादियाँ ग़ैर-क़ानूनी बना दी गईं. ये पाबंदियां जिप्सियों पर भी लागू की गईं. यही नहीं सत्ता में बैठे लोगों ने यहूदियों को व्यापार और उद्योग से भगाना शुरू कर दिया. 1933 में ही ऐसी परिस्थितियां बना दी गईं और 1937 के बाद तो यहूदियों का जर्मनी में रहना असंभव बना दिया गया और वे लोग देश छोड़कर अन्यत्र भाग जाने को मज़बूर होने लगे.

6 मार्च 1933 को जॉर्ज मैनजेर को, जो जनवादी विचारों वाला था और जो सत्ता के इन कदमों का विरोध करता थे, सरेआम बे-इज्ज़त किया गया और नाज़ी टुकड़ी ने उसे दीवारों पर लिखे जनवादी नारों को साफ करने को मज़बूर किया.

1 अप्रैल 1933 को हम्बेर्ग में नाज़ी टुकड़ी ने यहूदी व्यापारी ग्रिन्देलाल्ली को उसकी दुकान में जाने से रोक दिया क्योंकि सरकार ने पूरे देश में यहूदी व्यापारियों, डॉक्टर, वकीलों का बहिष्कार करने का हुक्म ज़ारी कर दिया था.

24 जुलाई 1935 को नाजियों ने च्रिस्तेना निमेन नाम की लड़की और उसके यहूदी बॉय फ्रेंड को पूरे शहर में गले में ये पट्टी लगाकर घुमाया, “मैं एक जर्मन लड़की हूँ और मैं अपनी मर्ज़ी से अपनी जर्मन नस्ल को एक यहूदी द्वारा कलंकित करने दे रही हूँ”.

मार्च 1938 में ऑस्ट्रिया को जर्मनी में मिला लिया गया और वहाँ के यहूदियों को सडकों और दीवारों पर लिखे नारे मिटाकर साफ करने को लगाया गया.

नवम्बर 1938 में पहली तबाही (पोग्रोम) की घटना घटी. 9 और 10 नवम्बर की सारी रात और अगले पूरे दिन जर्मन, ऑस्ट्रिया और चेक में यहूदियों के प्रार्थना स्थल लूटे-तोड़े-जलाए गए, यहूदियों के घरों पर कूड़ा फेंका गया, 25000 से 30000 यहूदियों को कंसनट्रेसन कैंप में डाला गया और उन्हें देश से भाग जाने को बोला गया. 10000 से अधिक यहूदी देश छोड़कर चले गए.

1 सितम्बर 1939 को जर्मनी ने पोलैंड पर हमला कर दिया और दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया. साथ ही यहूदियों, अपंगों और राजनितिक विरोधियों का उत्पीडन तीव्र हो गया. पोलैंड पर हमले के पहले हफ्ते में ही जर्मन सेना और पुलिस ने हजारों लोगों को गोली से मार डाला. साथ ही पोलैंड के संभ्रांत वर्ग, कैथोलिक चर्च के अधिकारीयों और दूसरे ग़ैर यहूदी लोगों को भी निशाने पर लिया जाने लगा. पोलैंड के यहूदियों के सामूहिक क़त्ल की प्रक्रिया शुरू हो गई.

•  1939 में ही हेर्श्च लास्कोव्सकी के बाल सड़क पर ही काट डाले गए और 1942 में उन्हें और उनके पिताजी और अन्य 8 को गोली से मार डाला गया.

11 नवम्बर 1939 को पोलैंड में हजारों लोगों को जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे, नाज़ी पुलिस की चौथी टुकड़ी ने जो वहाँ तैनात थी शहर से बाहर ले जाकर मार डाला.

1942 में नाजियों ने पोलैंड के 1800 अमीर लोगों को भी मार डाला.

युद्ध छिड़ जाने के बाद नाजियों ने अपने क़ब्ज़े में आए इलाकों में यहूदियों को देश से भगाने की नीति की जगह उन्हें बहुत बड़े/ औद्योगिक स्तर पर मार डालने की योजना बनाई. इसके लिए विशाल गैस चैम्बर बनाए गए. 1940-41 में 70,000 से भी अधिक लोगों को इन गैस चैम्बर में ज़हरीली गैस से मार डाला.

अगस्त 1940 में मानसिक रोग अस्पताल के 11000 रोगियों को मार डाला गया.

22 जून 1941 को हिटलर ने सोवियत संघ पर भयंकर हमला बोला. इसके साथ ही यहूदियों, युद्ध बंदियों, राजनीतिक विरोधियों को मार डालने की प्रक्रिया प्रचंड तेज़ हो गई. 1941-42 में रुसी युद्ध बंदियों को खाना नहीं दिया गया और उन्हें जर्मनी ले जाया गया जहाँ उनसे ज़बरदस्ती काम कराया गया. इस दौरान लगभग बीस लाख रुसी युद्ध बन्दी मार डाले गए. इसी दौरान नाजियों के चलते-फिरते मारक दस्तों ने लगभग 5,00,000 रुसी यहूदियों को मार डाला और नरसंहार की प्रक्रिया शुरू हो गई. सबसे भयानक क़त्लेआम रुसी हमले के दौरान ही हुआ. 

यहूदियों, हिप्पियों, अपंगों और अपने राजनितिक विरोधियों को छोटी सी बंद जगह में बने घेटो में अमानवीय तरीक़े से बंद कर भूख और बीमारियों द्वारा लाखों लोगों को मारने की व्यवस्था की गई.

हेनरिक हिमलर ने अप्रैल 1940 में पोलैंड ऑस्च्वित्ज़ में सबसे कुख्यात कंसनट्रेसन कैंप बनवाया, अनेक गैस चैम्बर बनवाए जहाँ कई लाख यहूदियों को गैस द्वारा मारा गया.  नाजियों द्वारा कुल मिलाकर 60 लाख यहूदियों को मारा गया. इसके आलावा भी कम से कम बीस और कंसनट्रेसन कैंप बनवाए गए.

एक नाज़ी अधिकारी छोटे गड्ढों में ज्यादा लाशें कैसे समाई जा सकती हैं उसका तरीका समझा रहा है. वो बताता है कि एक लाश के ऊपर दूसरी लाश को इस तरह रखो कि ऊपर वाली लाश का सर उस तरफ रहे जिस तरफ नीचे वाली लाश के पैर हैं और बीच में जो जगह बच जाती है उसमें बच्चों की लाश ठूंस दो..इससे तुम्हें ज्यादा गड्ढे नहीं खोदने पड़ेंगे.

रुसी लाल सेना की विजय के समाचार के बाद उन कंसनट्रेसन कैंप और घेटो में भी विद्रोह आयोजित हुए. अपनी जान की परवाह ना कर बगावत की गई लेकिन नाज़ी जल्लादों से बचना वहाँ संभव ही नहीं था. सितम्बर 1942 में पोलैंड के बिअल्य्स्तोक, विलना ट्रेब्लिन्का, सोबिबोर कंसनट्रेसन कैंप के लोग और बंधुआ मज़दूर संगठित हो गए और उन्होंने हथियार भी इकट्ठे कर लिए लेकिन जल्दी इन विद्रोहों को बर्बरता पूर्वक कुचल दिया गया. 

नाज़ी फासीवाद नरसंहार में मारे गए लोगों के दिमाग सुन्न कर देने वाले आखरी बोल

मैं उस के ऊपर गिर गया लेकिन ये क्या, लाश ने करवट बदल ली. लकड़ी की तरह सूख चुके व्यक्ति की गर्दन में गोली मारी गई थी. मेरा हाल भी ऐसा ही होने वाला है, मैं बुदबुदाया और बिना हिले-डुले लेट गया. मौत के सामने धैर्य असीम हो जाता है. तब मैंने धीरे से एक फुसफुसाहट सुनी. उसके कान में खून मिली मिटटी जम गई थी.---- स्ज़ेन्त्किराल्य्स्ज़बद्जा 31 अक्टूबर 1944.  

हंगरी के प्रतिष्ठित कवि मिक्लोस राद्नोती (1909-1944) की नोटबुक में उनकी आख़री कविता. उन्हें इस कविता लिखने के कुछ दिन बाद ही पश्चिमी हंगरी के यहूदी ग्योर के साथ मार डाला गया था. वो व्यक्ति गर्मी के दिनों से ही लेबर कैंप से जर्मनी तक की अपनी अन्तिम यात्रा पर था. राद्रोती की लाश की 1946 में पहचान हो सकी क्योंकि उनकी जेब में उनकी ये डायरी थी.

दोपहर के खाने के बाद पांच गाड़ियों में लदी लाशों को दफनाया गया. उन्हीं में एक गाड़ी में से एक औरत को बाहर फेंका गया. औरत का बच्चा उसकी छाती से चिपका था. उसने अपनी माँ के सूखे स्तन को चिचोड़ा और मर गया. उस दिन हमने सर्च लाइट की चांदनी में शाम 7 बजे तक काम किया. उसी दिन एक गाड़ी गड्ढे के इतने नज़दीक तक गई कि उसमें से हमें रुंधी हुई चीख़ सुनाई पड़ी, लाचार-बेबस लोगों की आखरी चीखें और दरवाज़ा बंद होने की अवाज़. काम समाप्त होने से पहले गड्ढों में काम कर रहे 6 मज़दूरों को मारा डाला गया था.

मेरे प्यारे बच्चे, माइकल से अलग मत होना. खुद को बच्चों के कमरे तक मत ले जाने देना. पापा को लिखना, शायद वो तुम्हारी कुछ मदद कर सकें, पौलेट को लिखना, रास्ते में गोश्त बेचने वाले से बात कर सलाह लेना. क्या पता भगवान तुम पर दया कर दें. हम कल जा रहे हैं, क्या पता कहाँ!! मैं इन आंसुओं में तुम्हें गले लगाना चाहती हूँ , मैं तुम्हें बहुत प्यार से गले लगाना चाहती हूँ, मेरे बदनसीब बच्चे, अब मैं तुम्हें कभी नहीं देख पाऊँगी’... सुजेन बुरिनोव्ची का अपनी बेटी क्लौदिन को लिखा पोस्ट कार्ड जो उन्होंने 26 सितम्बर 1942 को पेरिस के नज़दीक द्रन्च्यी ट्रांजिट कैंप में लिखा था. सुजेन बुरिनोव्ची का जन्म 1904 में जस्सी रोमानिया में हुआ था. उन्हें पेरिस में उनकी माँ के साथ यहूदियों पर हो रही पुलिस दबिश में गिरफ्तार किया गया था. 27 सितम्बर को उन दोनों को ऑस्च्वित्ज़-बिरकेनाऊ कॉनसेनट्रेसन कैंप भेजा गया था जहाँ पहुंचते ही उन्हें गैस चैम्बर में मार डाला गया था.

एक महिला ने, जिनका पहला नाम फेला था, जर्मन अधिकार वाले पोलैंड के कुटनो से वॉरसॉ घेटो में अपने परिवार को लिखा था. भूमिगत कम्युनिस्ट अखबार मोर्निंग फ्रीडमने 9 फरवरी 1942 को इसे छापा था. ज़हरीली गैस से लोगों को मरे जाने का ये पोस्टकार्ड पहला सबूत बना. फेला का कहीं कुछ पता नहीं चला...मेरे प्रिय जनो, मैंने अपने ऊपर टूट पड़ी मुसीबत पर आपको पहले भी एक कार्ड भेजा था. ये लोग हमें गैस से मार डालने के लिए चेल्नो ले जा रहे हैं. वहाँ पहले से ही 25000 यहूदी मौजूद हैं. क़त्ले आम ज़ारी है. क्या आपको हम पर बिलकुल दया नहीं आती? मेरा बच्चा नतन और माँ यहाँ से बचकर भाग गए हैं और कोई नहीं आ सका. मालूम नहीं हमारा क्या होगा. अब और जीने की जान मुझमें नहीं बची है. अगर ब्रोनिया आंटी अगर लिख सकें तो सब कुछ लिखें. मैं तुम्हें अपना शुभकामना सन्देश प्रेषित कर रही हूँ. ---- फेला

6 अप्रैल 1943 का एक डायरी नोटजित्शोच्क रुदाशेव्सकी (1927-1943) उस वक़्त महज 13 साल की थीं जब नाजियों ने विलना पर क़ब्ज़ा किया था और यहूदियों को घेटो में डाला था. सितम्बर 1943 में नाजियों ने घेटो को ख़त्म करना शुरू कर दिया था.  रुदाशेव्सकी अपने परिवार और दोस्तों के साथ छुप गई. उनके चचेरे भाई सोरे वोलुश्किन को छोड़ सारे लोग ढूंढ लिए गए और वहीँ मार दिए गए जहाँ पोनरी जंगल में सामूहिक नरसंहार हुआ था. लाल सेना द्वारा हुई मुक्ति के बाद सोरे वोलुश्किन को ये डायरी मिली थी... अब हमें सब भयानक बातें मालूम पड़ चुकी हैं. 5000 यहूदियों को कोव्नो नहीं बल्कि पोनार ले जाया गया था जहाँ उन सब को मार डाला गया. एक दम जंगली जानवरों की तरह लोग मरने से पहले मौत के डर से गाड़ी के डिब्बों को तोड़ने लगे थे, तारों से ढकी छोटी-छोटी खिड़कियों को तोड़ने लगे थे. भागने वाले सैकड़ों लोगों को गोलियों से भून डाला गया था. रेलवे लाइन पर बहुत दूर तक लाशें ही लाशें बिछ गई थीं.

मेरी सबसे प्यारी हेरता एवं लोरे, हम अब एक दूसरे से कभी नहीं मिलेंगे. मैं आप दोनों के शुभाकामनाएं भेज रहा हूँ. मुझे प्यार से याद करना जैसे कि मैं आप दोनों को याद कर रहा हूँ. आख़री सलाम. आप दोनों को मेरा तहे दिल प्यार. अलविदा, मैं जा रहा हूँ हमेशा के लिए.’..प्रथम विश्व युद्ध के जांबाज़ सैनिक और 65 वर्षीय व्यापारी रिचर्ड ओस्चिंसकी का अपनी पत्नी हेरता और अपनी बेटी लोरा बरता के नाम 9 अगस्त 1942 को लिखा गया आख़री ख़त.

उस दिन उन्होंने बोजनेर सड़क के बर्लिन के अपने फ़्लैट में आत्म हत्या की थी. लोरा 1939 में बेल्जियम होते हुए इंग्लॅण्ड भाग गई थीं और बाद उनकी माँ भी उनके साथ वहीँ जाने में सफल हो गई थीं. बर्लिन में 1939 में कुल 1,60,000 यहूदी रहते थे. 90,000 भाग गए और 55,000 मार डाले गए और 7000 ने आत्म हत्या कर ली थी और 1945 में जब वे मुक्त हुए तब केवल 8000 ही जीवित बचे थे.

19.6.1944; ‘हम इस वक़्त बहुत ही विनाशकारी वक़्त में जी रहे हैं. हजारों लोगों को समन भेजे जाते हैं कि उन्हें दूर काम पर भेजा जाता है. सब जानते हैं कि इसका क्या मतलब है और आतंकित और भयभीत हैं. एक दूसरे को ढाढस बंधाते हैं कि क्या पता सचमुच ही काम पर जा रहे हों. अगर वाक़ई काम पर जा रहे हों तो किसी को क्या आपत्ति होगी. फिर भी सांत्वना देते हैं कि काम पर ही जा रहे हैं. क्या पता ये सच ही हो. वैसे भी हम लोग उस सीमा तक पस्त हो चुके हैं, हताश हो चुके हैं कि ज़िन्दगी और मौत में फ़र्क ही नहीं बचा है.’..

जून 1944 से नाज़ियों ने लोद्ज़ के घेटो को जिसे उन्होंने 1940 में बनाया था, ख़त्म कर दिया था. वहाँ, चेल्मनो और औष्वित्ज़ में जो भी लोग जिंदा बचे थे उन सब को ज़हरीली गैस से मार डाला गया. जनवरी 1942 से ही यहूदियों को वहाँ भरना शुरू कर दिया था. एक नवयुवक ने ये सब अपनी डायरी में नोट किया था. उसके पास पेपर नहीं था लेकिन एक उपन्यास था और उस उपन्यास की खाली जगह पर सब नोट करता था कि वहाँ स्थिति कितनी भयावह है. उसने ये सब चार भाषाओँ; यिद्दिश, पोलिश, इंग्लिश और हिब्रू में लिखा था. उसके बारे में बाद में कुछ पता नहीं चला.

अफवाहें डरावनी हैं. नाज़ी यहूदियों को अनेक तरीकों से मार रहे हैं. कुछ को बंधुआ मज़दूर बनाया जा रहा है जहाँ वे ज्यादा से ज्यादा एक महीना ही जीवित रह पाते हैं. उससे ज्यादा जिंदा रह पाना मानवीय क्षमता से बाहर की बात है. कुछ को गोली मार दी जाती है, कुछ को जला दिया जाता है और कुछ को ज़हरीली गैस से मर दिया जाता है’...चैम ए कापालन के डायरी में नोट---25 जून 1942, शिक्षाशास्त्री और हिब्रू के विद्वान कापालन (1880-1942/43) ने वॉरसॉ के यहूदियों के दमन की दास्ताँ अपनी डायरी में लिखी है. 1942 के अंत में उन्हें और उनकी पत्नी को ट्रेब्लिन्का की कत्लगाह ले जाया गया और उन्हें ज़हरली गैस देकर मार डाला गया.

मार्सेल नद्जरी (1917-1971) की कई मौसम झेल चुकी डायरी ऑस्च्वित्ज़ में 1980 में हाथ लगी. उन्हें एथेंस से अप्रैल 1944 में ऑस्च्वित्ज़ भेजा गया था और उन्हें शमशान घर में काम करने को मज़बूर किया गया था. वे जिंदा बच गए थे और वापस ग्रीस आ गए और आखिर में अमेरिका में बस गए थे......गैस दी जा चुकी है..हम इन लाशों को ले जाते हैं...बेक़सूर औरतें...जिन्हें भट्टी में लाया जाता है...उन्हें भट्टी के अन्दर रख दिया जाता है...

हमें मज़बूर किया जाता है कि हम उसे एक छलनी में छालें और सब कुछ एक गाड़ी में भरें. उसे ले जाकर एक नदी में खाली कर दिया जाता है. सारे अवशेष मिटा दिए जाते हैं. मेरी आँखों ने जो दृश्य देखे हैं उनका वर्णन नहीं किया जा सकता. लगभग 6,00,000 यहूदी जो कुछ हंगरी से हैं, कुछ फ़्रांस से, कुछ पोलैंड से....

एट्टी हिल्लेसुम (1914-1943) को जब 7 सितम्बर 1943 को वेस्तेर्बोर्क से ऑस्च्वित्ज़ ले जाया जा रहा था तब उन्होंने एक पोस्ट कार्ड लिखकर रेलगाड़ी की खिड़की से बाहर फेंक दिया था . ऑस्च्वित्ज़ में कुछ हफ़्तों बाद ही उन्हें मार डाला गया. काफ़ी दिन उन्होंने उन यहूदियों की देखभाल की थी जिन्हें वहाँ से पूरब में डच कैंप वेस्तेर्बोर्क ले जाया जाना था. ‘...मैं भरी हुई मालगाड़ी के डिब्बे के बीचोंबीच एक बोर पर बैठी हूँ.

माँ, पिताजी और मिस्चा कई डिब्बे दूर हैं. आखिर में बिना किसी सूचना के गाड़ी चल पड़ी. हेग से आए खास आदेश के अनुसार... शोक गीत गेट हुए..माँ, पिताजी मिस्चा गुमुसुम बैठे होंगे..हमें कई दिन चलते जाना है...

ज़रूरी नहीं कि आप क्रांतिकारी ही हों. जागरुक, विवेकशील होना और एक सही कदम लेना ही काफी है आपको यहूदियों के लिए बिछे जाल में फंस जाने के लिए और भयानक मौत के आगोश में पहुँच जाने के लिए ...गुस्टा डेविडसन (1917-1943) अपने पति शिमोन के साथ क्राकोव, पोलैंड में यहूदी युवाओं का एक कैंप चलाती थीं जहाँ से एक प्रतिकार आन्दोलन ने जन्म लिया. अपने एक नोट में जिसे उन्होंने नाज़ी पुलिस गेस्टापो द्वारा गिरफ्तार कर लेने पर जेल से टॉयलेट पेपर पर लिखा था और छुपा लिया था, वे बताती हैं कि वे हर हाल में लड़ना चाहती थीं. वे वहाँ से निकल जाने में क़ामयाब भी हो गईं लेकिन नवम्बर 1943 में पकड़ ली गईं और उनके पति के साथ उन्हें क़त्ल कर दिया गया.

31 जुलाई 1942..प्रिय पिताजी, मैं मरने से पहले आपको अलविदा कह रहा हूँ. हमें ज़िन्दगी से कितना प्यार था लेकिन उन्होंने हमें जीने नहीं दिया और हम मरने वाले हैं. मैं इस मौत से बहुत भयाक्रांत हूँ क्योंकि जिन्दे बच्चों को ही गड्ढे में फेंका जा रहा है. हमेशा के लिए अलविदा, मैं आपके हाथ प्यार से चूमना चाहता हूँ’..  

ये एक बारह वर्षीय बच्चे जुद्यता विस्ज़ेनिका का अपने पिताजी के नाम एक ख़त है जो अमेरिका में हैं. जुलाई 1942 में नाज़ी दस्तों ने पूर्वी पोलैंड ब्य्टेन में हर यहूदी को मार डाला था. सिर्फ़ दो लोग जंगल में निकल जाने में सफल हुए थे. उन्हें भी 1943 के शुरू में मार डाला गया था. सोवियत यहूदियों के नरसंहार की ये कहानी एक काली किताब में लिखी है जिसका प्रकाशन सोवियत संघ में 1947 में बंद कर दिया गया था.

अगर मैं जीवित भी बच गया तो भी मेरे जीवन में अब क्या बचा है? अपने वॉरसॉ में अब मैं किस के पास जाऊंगा? अब मैं इस जीवन का बोझ किसके लिए और क्यों उठाऊँ?’ ... हेमंत क्रुक (1897-1944) द्वारा 30 सितम्बर 1942 को अपनी डायरी में लिखा एक नोट, जब उन्होंने सुना कि वॉरसॉ में नाजियों ने सभी यहूदियों को फांसी पर लटका दिया है. क्रुक ने विलना घेटो का वृतांत लिखा था. उन्हें भी 18 सितम्बर 1944 को कॉनसेनट्रेसन कैंप में मार डाला गया था.

बड़ा हमला होने के कारण आज लाशों का बहुत बड़ा ढेर आया... संभालना मुश्किल है ..कुछ को लटका हुआ ही छोड़ देना पड़ा क्योंकि उन्हें तीस घंटों तक इन्तेज़ार करना था.. कोई आवाज़ नहीं..कोई बोल नहीं..हम में हर किसी को सिर्फ़ इसलिए आधा होश बचा हुआ है क्योंकि सब थके हुए हैं, टूट चुके हैं ..तंग जगह ने हमें तोड़कर रख दिया है , बेदम कर डाला है और हमारी भावनाओं को भी सुन्न कर डाला है.

जैसे ही वैगन का दरवाज़ा खुलता उसमें से दो नाज़ी सिपाही निकलते. वे महिलाओं को उनकी शादी की अंगूठियों के बदले कुछ पीने को दे देते थे..’    लेज्ब लंग्फस (1910-1944) द्वारा लिखे वृतांत का बचा हुआ हिस्सा. उन्हें 1942 में एक घेटो से ऑस्च्वित्ज़ वाले सबसे भयावह मौत के कैंप में भेजा गया था और श्मशान गृह में ज़बरदस्ती काम पर लगाया गया था. 26 नवम्बर 1944 को उन्हें दूसरे एक सौ कैदियोंके साथ मार डाला गया था.

अब्राहम लेविन (1893-1943) की जेल डायरी में मिले नोट का हिस्सा..दो से तीन साल के पांच बच्चे सोमवार से गुरुवार तक बाहर खुले में एक बेंच पर बैठे हैं....लगातार चीख़ रहे हैं, चिल्ला रहे हैं.. मम्मा..मम्मा..मम्मा.. मुझे कुछ खाने को चाहिए.. नाज़ी सैनिक गोली चला देते हैं और बच्चे शांत हो जाते हैं ..हमेशा के लिए..

सत्यवीर सिंह

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