चवन्नी क्लास जमात इतिहास हो रही है - वीर विनोद छाबड़ा
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फिल्म इतिहास का सफ़र अधूरा ही समझिये अगर उसमें उसमें फ्रंटबेंचर यानि चवन्नी क्लास ज़िक्र न हो. आम चलन में चवन्नी क्लास का मतलब है, कम दिमाग का होगा. लेकिन फिल्मी संदर्भ में ये फिल्मबाज़ों की वो जमात है जिसकी जो अगली पंक्ति में बैठना पसंद करती है.

मैं मानता हूँ कि इस क्लास के पास उच्च वर्ग जैसी सोच नहीं होती है. लेकिन ये सत्य अपनी जगह स्थाई है कि ये क्लास फिल्म को दिमाग से नहीं दिल से देखती है. ये जमात सिनेमा के उद्भव से रही है.

जब मैंने होश संभाला तो सबसे आगे की क्लास की दर साढ़े पांच आने थी यानी तीस पैसे. उससे पहले ये प्रवेश दर चवन्नी रही होगी और शायद इसी के आधार पर इस क्लास के खरीदार को वर्ग को चवन्नी क्लास कहा गया. यों इनके दिमाग में कोई कमी नहीं थी. सस्ते मनोरंजन की अभिलाषा में समाज के निर्धन वर्ग ने इस क्लास को आबाद किया.

इस क्लास पर दिहाड़ी मजदूर, होटलों-गैराजों में काम करने वाला अल्प आय वर्ग का आधिपत्य रहा. शरीर पर कायदे के वस्त्र भी नहीं रहे. मैंने कई को कच्छा बनियाइन में देखा है. वो अभिजात्य, इलीट और अमीर वर्ग और जेंटरी क्लास से खौफ़ज़दा नहीं रहा. अपने घर में शेर. खुद-मुख्तियार है. निडर होकर बीड़ी-सिगरेट सुलगाता है.

गेटकीपर द्वारा डपटने पर अपमानित महसूस होकर छुरी-चाक़ू नहीं निकालता है. बुझा कर बचा हिस्सा रख लेता है, बाद में सुट्टा लगाता है. यह उसकी अपनी दुनिया है. अपनी सोच है, प्राथमिकताएं हैं.

यह क्लास भावुक ज्यादा रही है. करूणामयी दृश्यों पर ज़ार ज़ार रोती है, फूहड़ हास्य पर भी दिल खोल कर हंसती है, धांसू डायलाग पर ताली पीटती है, भद्दे दृश्यों पर फिकरे कसने में संकोच नहीं करती और मुजरों पर सिक्के भी उछालती है. इसे किसी फिल्म को बार-बार देखने में कोई परहेज़ नही है. 

जेब में कम पैसा होने के कारण बल्कि मुफ़लिसी के दौर में हमने इस क्लास के साथ बैठ कर अनगिनित फिल्में देखी हैं. आज भी हमारा दावा है कि फिल्म देखने का असली मज़ा चवन्नी क्लास दर्शक के साथ ही है, सती सावित्री से संगम तक. 

एक बात और कि चवन्नी क्लास में भी एक क्लास और रही, पहला दिन पहला शो देखने वालों की. पहला दिन, पहला शो ख़त्म हुआ नहीं कि बाद बाक्स आफ़िस पंडितों का हुजूम इनकी ओर दौड़ पड़ता है. भैया, फिल्म कैसी लगी? गाने और संगीत अच्छे तो लगे? फिल्म की रिपीट वेल्यू का फैसला यही क्लास करती रही है.

इस पहले दिन, पहले शो के दर्शक को अपनी कद्र बखूबी मालूम रही. और बड़ी ईमानदारी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की. बाज़ बाक्स आफिस एक्सपर्ट तो उनके चेहरे पर तैरती पैसा वसूलमुस्कान से ताड़ गये फिल्म सुपर-डुपर हिट होने जा रही है.

कई बार एक्सपर्ट बाकायदा भेष बदल इनके बीच बैठ कर इनकी प्रतिक्रिया नोट करते देखे गये. अगर इस क्लास को पहले शो में उबकाई आ गयी या पेशाब ज्यादा होने लगी तो समझिये कि फिल्म अगले हफ़्ते ही थियेटरों से खदेड़ दी जायेगी. मगर ऐसा भी होता है, विपक्षी खेमे ने पहले दिन, पहला शो देखकर निकले किसी चवन्नी क्लास से कहलवा दिया, भैया टिकट बेच कर मूंगफली खा लो.

मुगल-ए-आज़म जैसी क्लासिक भी बॉक्स ऑफिस पर पहले हफ़्ते इसी कारण से ठंडी पड़ी रही. लेकिन अगले हफ्ते जब चवन्नी क्लास फिल्म रिपीट को करने पहुंची तो बॉक्स ऑफिस झूम उठा.

मगर त्रासदी यह रही कि इस चवन्नी क्लास की किसी ने कद्र न की. हमारे इल्मो-ओ-अदब और नफ़ासत के सिरमौर शहर लखनऊ में तो इस क्लास को खासी मशक्कत और मारा-मारी करके टिकट हासिल होती थी. अगली क्लास के एडवांस का सिस्टम नहीं था. शो से आधा घंटा पहले टिकट बंटा. सीटें भी कम. कुल जमा अगली दो पंक्तियाँ यानी चालीस से साठ तक. बेहद सौतेला सलूक किया गया.

एक-आध को छोड़ कर सारे थिएटरों के पिछले बदबूदार हिस्से में इनकी बुकिंग विंडो रही. वो भी इतनी संकरी कि बामुश्किल एक हाथ घुस सके. पहले दिन की भीड़ तो ज़बरदस्ती दूसरा और तीसरा हाथ तक घुसेड़ देती थी. 

बुरी तरह हाथ भी छिल जाते थे. कुछ थिएटर में लोहे की सलाखों से बने तंग जंगले से हम गुज़रे. दबंगों को तो जंगले के ऊपर से भीड़ में कूदते देखा हमने.  इस हैवानी मंज़र ने हमें कई बार डराया और जिस्मानी तकलीफ़ दी. निर्बल अक्सर चोटिल और लहुलूहान हुए. भीड़ को कंट्रोल करने के लिये न पुलिस का माकूल इंतज़ाम रहा और न ही ज़ख्मी-लहुलुहान हुए टिकटार्थियों की मरहम-पट्टी की गयी. अपने शहर लखनऊ के कुछ थिएटर के  गुफानुमा जंगले हमें याद हैं नॉवेल्टी और जयहिंद. 

आर्थिक सुधारीकरण के दौर का असर शायद इस क्लास पर सबसे ज़्यादा पड़ा. = सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर एक-एक करके बंद हो गए हैं. महंगी टिकेट दर वाले मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर आ गए. मल्टीप्लेक्स में भी पहला दिन और पहला शो का एक ख़ास दर्शक वर्ग है लेकिन इसमें वो  दर्शक नहीं है जो फिल्म को रिपीट करता था. बहरहाल, आज इस बदले हालात में ये चवन्नी क्लास जमात बहुत छोटी होकर रह गयी है और बचे-खुचे सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में आखिरी सांस ले रही है. 

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