अर्धचंद्राकार स्वरूप खो कर काशी विश्वनाथ गलियारे की कीमत चुका रही है: अभय मिश्रा
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कहते हैं वाराणसी दुनिया का प्राचीनतम शहर है, इतिहास से भी पुराना. इस शहर में महादेव वास करते हैं. महादेव के शहर में जब गंगा प्रवेश करती है तो शहर के घाटों को छूती हुई अर्धचंद्राकार आकार लेकर बहती है. गंगा का उत्तरवाहिनी स्वरूप यहीं देखने को मिलता है.

सौ से ज्यादा घाटों के तकरीबन बीचों बीच पड़ता है ललिता घाट, यानी अर्धचंद्र का घुमाव या कर्व यहीं से मिलता है गंगा को. ललिता घाट से ही सीधा रास्ता जाता है बाबा विश्वनाथ मंदिर. गलियारा बनने के बाद ललिता घाट से बाबा आवास के दर्शन सीधे संभव हो गए हैं. प्रधानमंत्री ने विश्वनाथ कॉरिडोर के उद्घाटन के ठीक पहले यहीं ललिता घाट पर डुबकी लगाई थी जिसे पूरे भक्ति भाव से देशभर में टीवी चैनलों पर दिखाया गया.

अब हुआ यूं कि महादेव गलियारा बनाने के लिए बड़ी मात्रा में पुरानी इमारतों को रास्ते से हटाया गया और इमारतों का हजारों टन मलबा लाकर ललिता घाट की गंगा में डाल दिया. प्रधानमंत्री के स्नान के दौरान इस मलबे को हरे कॉरपेट से ढक दिया गया था, पानी से कचरा निकाला गया, नगवां पंपिंग प्लांट को बंद किया गया और पड़ोस में मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार रोक दिया गया था. ताकि स्नान की तस्वीरे हर एंगल से बेहतरीन आए. यहां से गंगा जल लेकर प्रधानमंत्री करीब पांच सौ मीटर चल कर बाबा पर जल चढ़ाने गए. वैसे कोर्ट ने गंगा बाढ़ बिंदु से पांच सौ मीटर तक निर्माण पर रोक लगा रखी है लेकिन पांच सौ मीटर का यह गलियारा फूड कोर्ट, लाइब्रेरी, टूरिस्ट सुविधाएं जैसी कई नई इमारतों का गवाह बनेगा.

प्रधानमंत्री के जाने के बाद ललिता घाट पर खड़ा होना भी मुश्किल है क्योंकि कचरा जमा हो गया और उसे आगे बहने की जगह भी नहीं है. ललिता घाट में डाले गए मलबे को आधार बना कर एक जेट्टी का निर्माण किया जा रहा है. जेट्टी सौ फीट लंबी और डेढ़ सौ फीट चौड़ी होगी. विचार यह है कि पर्यटक समूहों से लदी रो रो क्रूज इसी जेट्टी पर उतरेंगी और पर्यटक सीधे बाबा के दरबार में पहुंच जाएंगे. धारा के भीतर तक घुसकर बनाई जा रही इस जेट्टी के कारण ललिता घाट पर बहाव रुक गया और अर्धचंद्राकार स्वरूप भी बिगड़ गया क्योंकि घुमाव की जगह ही नहीं बची. नदी वैज्ञानिक प्रोफेसर यूके चौधरी ने कई बार पत्र लिखकर सरकार को इस बाबत चेताया है, उनका मानना है कि इस बांधनुमा निर्माण से गंगा के वेग में कमी आएगी और गंगा घाटों को छोड़ देगी. इससे दशाश्वमेध से लेकर अस्सी तक बालू व सिल्ट भारी मात्रा में जमा हो जाएगी.

ललिता घाट के बाद वरुणा पार तक मालवीय पुल के पास कटाव होगा और पुल के क्षतिग्रस्त होने की आशंका बढ़ जाएगी. ललिता घाट पर बनाया गया बांध 90 डिग्री के कोण पर बनाया गया है. इससे बाढ़ के दौरान कटाव कई गुना तेज होगा.

हाईकोर्ट ने गंगा का बहाव बचाए रखने के लिए कई आदेश जारी किए हैं लेकिन पहले के आदेशों की तरह इसकी भी काट प्रशासन के पास है. जनवरी 2020 के विश्वनाथ कॉरिडोर निर्माण के लिए अनापत्ति पत्र देते समय जिला कलेक्टर ने साफ लिखा है कि किसी भी तरह का मलबा गंगा में नहीं डाला जाएगा और न ही बहाव को बाधित किया जाएगा. लेकिन वास्तविकता मे प्रशासन ने अपने ही आदेश की धज्जियां उड़ा दी.

पिछले साल इसी तरह गंगा पार रामनगर में रेत की नहर का निर्माण किया जा रहा था जिस पर 12 करोड़ रूपए खर्च कर दिए गए थे. वहां भी विचार गंगा को रेवेन्यू मॉडल बनाने का ही था. एक नदी जैसी नहर, जिसके दोनों किनारों पर रेत के टीले और उनमें लगे स्विस टेंट. खाने-पीने की पूरी छूट, और क्या चाहिए इस आइलैंड में. एकदम सी-बीचजैसा माहौल जहां पर्यटक पैराग्लाइडिंग, स्कूबा डाइव, ऊंट, हाथी और घोड़े की सवारी का लुत्फ ले सके. पर्यारवणविदों की चेतावनी को दरकिनार कर नहर बना दी गई जिसे पहली बारिश ने ही बहा दिया.

लेकिन सबक न सीखने की जिद पर अड़े प्रशासन ने दोबारा नहर को बनाने के लिए कमर कस ली है. वे यह समझने को तैयार ही नहीं कि गर्मियों में नहर की वजह से समस्या और बढ़ेगी. पहला तो पानी की कमी से जूझ रही मुख्य धारा में पानी और भी कम हो जाएगा दूसरा पानी कम होने से सेडीमेंट ज्यादा टूटेंगे जिससे गंदगी ज्यादा जमा होगी.

वैसे श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनकर तैयार है, गंगा की ओर देखे बिना बाबा विश्वनाथ के दर्शन कीजिए वाराणसी खूबसूरत नजर आएगा. उसे गंगा पथ के साफ-सुथरे शहर का तमगा भी मिला हुआ है.

अभय मिश्रा

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह लेख उनका निजी विचार हैं)

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