राजनीति में जाति तथा जाति का राजनीतिकरण
up election
जातीय नेतृत्व द्वारा जातीय हितो या मुद्दों को उठाकर जाति में अपना समर्थन बढ़ाकर राजनीतिक लाभ उठाना ही जातिगत राजनीति है। अतः राजनीति में जातिवाद के प्रभाव को जातिगत राजनीति कहा जा सकता है। जातीय संघों अथवा संगठनों ने जातिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा को बढ़ाया है। इसके अंतर्गत क्षेत्र विशेष में कोई जाति विशेष राजनीतिक रूप से ज्यादा प्रभावशाली एवं शक्तिशाली होती है।

जाति प्रथा किसी ना किसी रूप में संसार के प्रत्येक क्षेत्र में पाई जाती है बाबू जगजीवन राम के शब्दों में 'जाति भारतीय राजनीति की सर्वाधिक महत्वपूर्ण सत्यता है' एक सामान्य भारतीय अपना सब कुछ त्याग सकता है परंतु जाति व्यवस्था में अपने विश्वास की तिलांजलि नहीं दे सकता है। जाति प्रथा भारतीय हिंदू समाज की प्रमुख विशेषताएं हैं।

जाति और राजनीति में संबंध

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रारंभ होने से भारतीय समाज में स्थापित जाति प्रथा ने मतदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना प्रारंभ कर दिया और जाति की राजनीति में भूमिका से जाति एक महत्वपूर्ण प्रभाव कारी तत्व बनती चली गई। इस प्रकार वयस्क मताधिकार लागू करने के पश्चात जाति एक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर कर सामने आई।

राजनीति में जातिवाद के प्रभाव को जाति का राजनीतिकरण कहा जा सकता है। लोकतांत्रिक राजनीति के अंतर्गत राजनीति,जाति के संगठन के माध्यम से अपना आधार दृढ़ करती हैं जाति ने राजनीति में अपनी भूमिका निर्वाह हेतु नवीन रूप धारण कर लिया है। सभी राजनीतिक दल सिद्धांतः जातिवाद की निंदा करते हैं किंतु जातीय ध्रुवीकरण के माध्यम से सत्ता प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। राजनीतिक दलों द्वारा प्रत्याशियों का चयन तथा सफलता की संभावना का आकलन जातीय मापदंडों से किया जाता है योग्यता सेवा तत्वों की उपेक्षा की जाती है।

 मंत्रिमंडल का निर्माण करते समय यह ध्यान रखा जाता है कि सभी जातियों को प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाए। जातीयां सरकार की निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं इसका उदाहरण है अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण, मंडल आयोग द्वारा अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण का क्रियान्वयन। प्रशासन में भी आरक्षण के माध्यम से जाति को महत्व प्रदान किया गया है। राजनीतिक नेतृत्व का जनाधार केवल जातिगत आधार तक ही सीमित है। जातीय संघर्ष से राजनीति के अंतर्गत हिंसा का प्रवेश हो गया है और जाति एक उपलाभ पदावली बन गई है।

राजनीति में जाति की भूमिका

राजनीति पर जाति व्यवस्था का प्रभाव समय के साथ-साथ बढ़ रहा है लेकिन जाति व्यवस्था का रूप परिवर्तित होता रहता है। स्वतंत्रता के बाद भारत के राजनीतिक क्षेत्र में जाति का प्रभाव पहले की अपेक्षा बढ़ा है अतः भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका का अध्ययन नियमानुसार किया जा सकता है-

राजनीति के अंतर्गत सफलता प्राप्त करने के लिए जाति प्रधान राजनीतिक दलों का विकास हो रहा है। यह नेता की भावनाओं को उभार कर राजनीतिक लाभ उठाते हैं और उसी के आधार पर चुनाव जीतने का प्रयास करते हैं जैसे लोकदल पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी आदि। राजनीतिक दलों द्वारा जातिगत आरक्षण के माध्यम से हितों को पूरा करने की होड़। 

मंत्रिमंडल के निर्माण में जातिगत प्रतिनिधित्व जैसे ब्राह्मण ,जाट ,राजपूत ,कायस्थ ,दलित पिछड़े आदि। जाति एवं प्रशासन-भारत में प्रतिनिधि संस्थाओं के अलावा प्रशासन में भी जातिगत आरक्षण की व्यवस्था की गई है अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति के अलावा अन्य पिछड़े वर्गों को भी आरक्षण दिया गया है।

राजनीतिक दल एवं उम्मीदवार चुनाव प्रचार में जाति का खुलकर प्रयोग करते हैं चुनाव के समय जातीय समीकरण बैठाए जाते हैं। प्रत्येक राजनीतिक दल क्षेत्र विशेष में जिस जाति का बाहुल्य है उसमें उसी जाति के बड़े नेता का चुनाव प्रचार हेतु भेजने का प्रयत्न करते हैं। जो लोग जातीय संगठनों में उच्च पदों पर पहुंच गए हैं वे ही राजनीति में भी अच्छे स्थान प्राप्त करने में सफल हुए हैं ऐसे लोग राजनीति में चाहे खुलकर जातिवाद का सहारा ना लें फिर भी यह अपनी पृष्ठभूमि को नहीं भूलते। वे अपने जातीय हितों की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पैरवी करते रहते हैं।

राजनीति में जाति की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन

राजनीतिक दलों ने जब जनता को सम्मोहित करने में अपने आप को असमर्थ महसूस किया तब राजनीति का खेल खेलने के लिए नेताओं ने राजनीति में जातिवाद का सहारा लिया। दलित शोषितों के उत्थान की आड़ में जातिवाद को राजनीति का अनिवार्य अंग बना दिया। जातिवाद के कारण जहां राज्य का उद्देश्य जनकल्याण का था उसको बदलकर रख दिया उसका वास्तविक उद्देश्य विभिन्न जातियों को संतुष्ट करने का रह गया। राजनीतिक दलों ने जातियों को वोट बैंक के रूप में हमेशा प्रयुक्त किया है।

अतः राजनीति में समाज व्यवस्था के दोषों को बढ़ावा देकर उसे परस्पर जाति संघर्ष एवं वैमनस्यता की आग में डाल दिया जिस पर राजनेता अपने हाथ सेंकते रहे हैं। जातिवाद में लोकतंत्र की धारणा के विरुद्ध काम किया है। जाति व्यवस्था ने राष्ट्र के एकीकृत स्वरूप के लिए संकट पैदा कर दिया है। फिर भी यह सत्य है कि जाति भारत के समाज की महत्वपूर्ण इकाई जिसकी उपेक्षा करना आसान नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि जाति के नकारात्मक स्वरूप के स्थान पर सकारात्मक स्वरूप की स्थापना की जाए। रुडोल्फ के अनुसार "जाति व्यवस्था ने जातियों के राजनीतिकरण मे सहयोग देकर परंपरा वादी व्यवस्था को आधुनिकता में डालने का कार्य किया है। "

उपरोक्त  बिंदुओं के आधार पर कहा जा सकता है कि आधुनिक भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव कैंसर एवं एड्स जैसे भयंकर रोगों की तरह सर्वत्र फैल गया है जिसका निदान असंभव सा है। भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका का मूल्यांकन करना अत्यंत जटिल कार्य है। यह केवल व्यक्ति-व्यक्ति के बीच खाई पैदा नहीं करती अपितु राष्ट्रीय एकता के मार्ग में भी बाधा उत्पन्न कर रही है। आज राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा जातिगत हितों को विशेष महत्व दिया जा रहा है, जिसके कारण हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हो रही हैं।

Share this story