भारत में फासिज्म का रोडमैप
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राहुल गांधी बढ़िया हिंदू बनाम खराब हिंदू वाली लड़ाई में कूद पड़े हैं या यूं कहिये फंसा दिये गये हैं। हिंदू बहुतायत में हमेशा से वही रहा है, जो गोडसे था। किसी भी धर्म में बहुतायत में ऐसे ही लोग होते हैं।

संवेदनशील राजनीतिक नेतृत्व का काम यह होता है कि वो जनता के मन में उन प्रवृतियों के प्रति घृणा पैदा करे जो लोकतंत्र और वृहत समाज के लिए ख़तरनाक हैं। आज़ादी की लड़ाई के दौरान उन लोगों को कांग्रेस की सदस्यता नहीं दी जाती थी कि जिनका संबंध मुस्लिम लीग और आरएसएस के साथ हो।

मोहम्मद अली जिन्ना तक को पाकिस्तान की आज़ादी के बाद अपने पहले भाषण में कहना पड़ा था कि धर्म का राज्य के कामकाज पर कोई दखल नहीं होगा। हर कोई अपनी आस्थाओं के मुताबिक आचरण के लिए स्वतंत्र है।

धर्म की राजनीति को लेकर भारतीय मानस में हमेशा से एक तरह का घृणा का भाव था। अपनी तमाम कमियों के बावजूद आज़ादी के शुरुआती 30-40 में कांग्रेस ने इस भाव को बनाये रखने में कामयाबी हासिल की।

नतीजा ये था कि आरएसएस को अपने पांव जमाने के लिए कभी समाजवादियों की उंगली पकड़नी पड़ी तो कभी वामपंथियों से तालमेल बिठाना पड़ा।

राम मंदिर का झंडा उठाने वाली आडवाणी और वाजपेयी की बीजेपी ने हमेशा से गाँधीवादी-समाजवादी होने का दावा किया। मुसोलिनी, मुंजे, सावरकर और गोलवकर को अपना वैचारिक पूर्वज बताने में उन्हें शर्म आती थी। 

2014 में मोदी के आगमन के बाद  लोकसभा में सीपीएम के मोहम्मद सलीम ने किसी पत्रिका का हवाला देते आरोप लगाया कि राजनाथ सिंह ने नमो को पृथ्वीराज चौहान के बाद का सबसे बड़ा हिंदू शासक बताया है।

इस पर राजनाथ सिंह ने लगभग रूआंसा होते हुए कहा कि मैं जो भी कहता हूं, जिम्मेदारी के साथ कहता हूं। मेरे बयान को तोड़ा-मरोड़ा गया। मैं इस इल्जाम से अत्यंत आहत हूं। यानी शर्म 2014 की शुरुआत में भी बाकी थी।

लेकिन अब? सोशल मीडिया पर अपने हर पोस्ट में अमित शाह प्रधानमंत्री को `धर्म ध्वज रक्षक' करार  दे रहे हैं। भारत का फासिज्म अपना पहला चरण पूरा कर चुका है। अगले चरण में क्या होगा?

संकेत राहुल गांधी के बयान से मिल चुका है। हालांकि वो गांधी का हिंदू बनाम गोडसे का हिंदू बनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इसके दो बड़े ख़तरे हैं। पहला ख़तरा ये है कि गोडसे हर घर में मौजूद है और जाने-अनजाने में उसे वैधता दिलाने की प्रक्रिया तेज़ होगी। 

दूसरा और ज्यादा बड़ा ख़तरा हिंदू बनाम हिंदू होने का है। पहले लड़ाई 'राजनीतिक हिंदू' बनाम शेष भारत था। हिंदू बनाम हिंदू चुनते ही कांग्रेस ने मुसलमान समेत सभी अल्पसंख्यक समूहों को छोड़ दिया है। शायद उसे लगता है कि ये लोग झक मारकर पीछे-पीछे आएंगे ही। ये उसकी बहुत बड़ी भूल है।

संघप्रिय औवैसी अपने एजेंडे के साथ तैयार हैं। वे देश के कोने-कोने में घूम-घूमकर बताएंगे कि मेन स्ट्रीम पार्टियों के पीछे चलकर मुसलमानों को कुछ भी नहीं मिला। हमेशा की तरह भावुक मुसलमानों का एक बड़ा तबका उनके पीछे-पीछे जाएगा।

मुस्लिम मतों का विभाजन होगा और मुसलमान भारतीय राजनीति में और ज्यादा अप्रसांगिक होते चले जाएंगे। ओवैसी का मजबूत होना बीजेपी के राजनीतिक हिंदू गढ़ने के मंसूबों को और मजबूत करेगा। भारत में फासिज्म का विकास अपने अगले चरण में पहुंच जाएगा।

सिर्फ गांधी का रास्ता पांच हज़ार साल के विविध, बहुल और समावेशी भारत को फासिस्ट इंडिया होने से बचा सकता है। लेकिन इसके लिए सचमुच गांधी होना पड़ेगा, केवल गांधी नामधारी होने से नहीं चलेगा।

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