सरकार का टूल किट तो नहीं है टेक-फॉग, इसका इस्तेमाल तो यही इशारा करता है
ravish kumar

चुनाव राजनीति में तकनीक कम से कम होनी चाहिए। जितनी अधिक तकनीक होगी, उतनी ही अधिक हेराफेरी होगी। द वायर ने टेक-फॉग एप का जो पर्दाफ़ाश किया है, उसे ठीक से समझिए।

आपके ही बेटे, दोस्त, परिवार के सदस्य नफ़रत की इस आंधी की चपेट में आ रहे हैं। ट्रोल बन रहे हैं। ट्रोल दंगाई का ही एक रुप है। हर ट्रोल क़ानून का अपराधी है। चाहे उसका खाता असली है या नक़ली। पहचान बदल लेने से अपराध नहीं बदल जाता।

आप एक बार फिर से उस तंत्र के बारे में सोचिए जिसके ज़रिए कोई आपकी सोचने की क्षमता को रौंद कर राज करना चाहता है। अपने राज करने के लिए आपको, आपके बेटों को दंगाई बना रहा है। सोचिए ये आदमी राज करने के लिए या इसके लिए माहौल बनाने के लिए महिला पत्रकारों के अंगों की बनावट का डिटेल हासिल किया जा रहा है ताकि उसका इस्तमाल उन पर हमला करने में हो।

आभासी दुनिया में मुस्लिम महिलाओं की नीलामी का सुख लेना सिखाया जा रहा है। फिर आप ट्रक के पीछे लिख देंगे कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ तो नारी का सम्मान हो जाएगा।  सनक की सियासत हो रही है।

टेक फ़ॉग किसका टूलकिट है समझ आ रहा है। पता चल रहा है कि किसकी तरफ़ से किसे निशाना बनाया जा रहा है। हम नहीं जानते कि केवल यही एक एप है या इसके और भी रुप हैं। आपने किसी को सत्ता दी कि देश बनाए, वो एप बनवा रहा है ताकि आप देश के नाम दंगाई बन जाएँ। वरना इस ख़बर के छपते ही सरकार दो मिनट में हरकत आती लेकिन कैसे आएगी। आप जानते हैं।

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