दलितों का असली मसीहा कौन? अम्बेडकर, गांधी या पेरियार? तीनों, या इनमें से कोई नहीं? यह अनंत विवाद है।
ambedkar gandhi

जब जाति का प्रश्न है तो बात जाति से शुरू करता हूँ। इन तीनों में सिर्फ़ एक जन्मना दलित समाज से थे, और बाकी दो बनिया/व्यवसायी समाज से थे। तीनों में एक भी ब्राह्मण नहीं थे।

तीनों में सबसे अधिक, बल्कि संपूर्ण भारत में ही सबसे अधिक किताबें पढ़ लेने वालों में भीमराव अम्बेडकर का नाम उभरता है। बाकी दोनों अपने इंस्टिक्ट’, अपने जनमानस से जुड़ाव, और अपने प्रयोगों से बदलाव लाने की चेष्टा करते।

अम्बेडकर सिद्धांतवादी (थ्योरिस्ट) अधिक थे, और प्रयोगधर्मी इन दोनों की अपेक्षा कम। जो लोग विज्ञान से जुड़े हैं या जानकारी है, वे सिद्धांत और प्रयोग में अंतर बखूबी जानते होंगे। प्रयोगशाला में सिद्धांतों की दिशा में परीक्षण होता है, जिसमें कभी विस्फोट होता है, कभी प्रयोग ही ग़लत निकल जाता है।

सिद्धांत की रचना उससे अधिक बौद्धिक तीक्ष्णता वाले मानुष करते हैं, और वह काग़ज़ पर सभी तर्कों के साथ प्रस्तुत होता है। अम्बेडकर के सिद्धांतों में ग़लतियाँ ढूँढना कठिन है, पेरियार या गांधी के प्रयोगों में ग़लतियों का होना या उन्हें ढूँढना आसान। 14 अगस्त, 1931 की एक दोपहर भीमराव अम्बेडकर मलाबार हिल स्थित मणिभवन पहुँचे।

कहिए डॉक्टर साहब! आपकी क्या राय है?”, गांधी ने मुस्कुरा कर पूछा मैं तो आपकी राय जानने आया था। आप चाहें तो मुझसे सीधे सवाल पूछ सकते हैं, मैं उत्तर दूँगा।”, अम्बेडकर ने सीधे गांधी की आँखों में आँखें मिला कर कहा मुझे मालूम है तुम्हें मुझसे और कांग्रेस से शिकायत है। जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे,

उस समय से मैं अछूतों के प्रश्न पर सोच रहा हूँ। अपने स्कूल के दिनों से। मैंने कांग्रेस में विरोध के बावजूद इस प्रश्न को बारम्बार रखा। इसे धार्मिक प्रश्न कह कर किनारे करने के प्रयास हुए, लेकिन मैंने इसे कांग्रेस के कार्यक्रम में सम्मिलित करने को कहा। अब तक कांग्रेस द्वारा बीस लाख रुपए इस प्रश्न पर खर्च किए गए।

महात्माजी! आप बड़े-बुजुर्गों की यह आदत होती है कि हर तर्क में अपनी उम्र का हवाला दे देते हैं। मुझे कोई शंका नहीं कि आप पहले पैदा हुए, और मुझसे पहले सोचना शुरू किया। मगर कांग्रेस ने बीस लाख रुपए खर्च कर क्या हासिल किया? आप मुझे उससे कम धन दें, तो मैं कहीं बेहतर नियोजन कर दूँगा।

आपसे एक अनुरोध करता हूँ। आपने कांग्रेसियों के लिए खादी अनिवार्य किया। आप एक और बात अनिवार्य करें। जो भी कांग्रेसी एक अछूत को अपने दरवाजे पर नहीं आने देता, उसकी सदस्यता रद्द कर दी जाए।

आप हिंदुओं के हृदय-परिवर्तन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मैं बिना लाग-लपेट के कहूँगा कि हमारा इन नेताओं और महात्माओं से विश्वास उठ गया है। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता अगर मुझे देश का गद्दार कहा जा रहा है। हम दलितों की क्या कोई मातृभूमि है?”

यह तुम्हारी मातृभूमि है, और जहाँ तक मैंने तुम्हारे गोलमेज़ सम्मेलन में वक्तव्य पढ़े, तुम एक सच्चे देशभक्त हो” “आप कहते हैं हमारी मातृभूमि है। जिस भूमि पर हमारे साथ कुत्ते-बिल्लियों से बुरा व्यवहार होता है? इस मिट्टी पर बहता जल नहीं पीने दिया जाता? मैं अगर इस भूमि पर हो रहे शोषण का विरोध करता हूँ, तो मुझे देशद्रोही कहलाने में कोई गुरेज नहीं। आपके शब्दों में अगर मैंने कोई देशभक्तिका कर्म किया है, तो वह इस भूमि की भक्ति के कारण नहीं, बल्कि अपने अंतरात्मा की आवाज़ से किया है।

कांग्रेस ने चुनाव में मुसलमानों और सिखों के प्रतिनिधित्व पर सहमति जतायी है। उनकी सामाजिक स्थिति हमसे कहीं बेहतर है। पहले गोलमेज़ सम्मेलन में हम दलितों के लिए चुनाव में आरक्षित प्रतिनिधित्व की बात हुई है, जिससे हमें आत्मसम्मान मिले। आपकी इस पर क्या राय है?” “मैं अछूतों को हिंदुओं से भिन्न रखने के ख़िलाफ़ हूँ। यह हिंदुओं के लिए आत्महत्या के समान है

आपकी राय के लिए धन्यवाद। अब कम से कम यह स्पष्ट है कि हम दोनों इस मूलभूत प्रश्न पर कहाँ खड़े हैं। मुझे अब यहाँ से जाने की आज्ञा दें।जिस समय ये दोनों आपस में बात कर रहे थे, उसी हफ्ते विरुधनगर में पेरियार कुछ तमिल अ-ब्राह्मण व्यवसायियों के मध्य एक आग्नेय भाषण दे रहे थे।

तभी उनके समर्थक व्यवसायी शण्मुगम चेत्तियार खड़े हुए और कहा, “रामास्वामी! तुम धर्म-विरोध में अंधे हो गए हैं। अब तुम्हारी इस एक रट से मैं तंग आ गया हूँ। तुम अंबेडकर से सीखो, जो आर्थिक और सामाजिक सुधार की बात करते हैं। यूँ देवी-देवता को अपशब्द कह कर में मुद्दा नहीं भटकाते।

यह कह कर चेत्तियार और एक अन्य व्यवसायी वी वी आर नादर गुस्से में निकल गए। पेरियार को आभास हुआ कि उनका प्रयोग ग़लत दिशा में जा रहा है।

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